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भरत-मिलाप तथा राम का राज्यभिषेक - युद्धकाण्ड (26)

>> Monday, April 26, 2010

हर्षविभोर भरत ने शत्रुघ्न को बुलाकर उन्हें यह शुभ समाचार सुनाया और रामचन्द्रजी के भव्य स्वागत की तैयारी करने का आदेश देते हुए कहा, "सभी देवस्थानों में सुगंधित पुष्पों द्वारा पूजन हो। सभी वैतालिक, नृत्यांगनाएँ, रानियाँ, मन्त्रीगण, सेनाएँ और नगर के प्रमुख जन श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन और स्वागत के लिये नगर के बाहर चलें। नगर के सभी मार्गों, बाजारों तथा अट्टालिकाओं को ध्वजा-पताकाओं आदि से सजाया जाये।"

दूसरे दिन प्रातःकाल सभी श्रेष्ठ नगरनिवासी, मन्त्रीगण, अन्तःपुर की रानियाँ आदि असंख्य सैनिकों के साथ श्रीराम की अगवानी के लिये उत्साहपूर्वक नन्दिग्राम आ पहुँचे। कौसल्या, सुमित्रा, कैकेयी आदि महारानियाँ अन्तःपुरवासी रानियों का नेतृत्व कर रही थीं। सभी के हाथों में रंग-बिरंगी पुष्पमालाएँ थीं। चीर वस्त्र और कृष्ण मृगचर्म धारण किये भरत मन्त्रियों एवं पुरहितों से घिरे हुये सिर पर चरणपादुकाएँ धरे प्रतीक्षा कर रहे थे। तभी दूर से दिव्य पुष्पक विमान आता दिखाई दिया। समस्त उपस्थित पुरवासियों के मन में हर्ष की लहर दौड़ गई और वे रामचन्द्रजी का जयजयकार करने लगे। भरत ने आगे बढ़कर अर्ध्य-पाद्य आदि से श्रीराम का पूजन किया और उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। रामचन्द्र जी ने आगे बढ़कर उन्हें अपने हृदय से लगा लिया। फिर भरत ने वैदेही के चरण स्पर्श करके लक्ष्मण को अपने हृदय से लगा लिया। इसके पश्‍चात् वे विभीषण, सुग्रीव तथा अन्य वानर वीरों से बड़े प्रेम से मिले। फिर शत्रुघ्न भी सबसे उसी प्रकार मिले जिस प्रकार भरत मिले थे। श्रीराम ने तीनों माताओं का पास जाकर बारी-बारी से सबके चरणस्पर्श किये। उनका आशीर्वाद ग्रहण करके उन्होंने गुरु वसिष्ठ के पास जाकर उन्हें प्रणाम किया। उधर सब नागरिक उच्च स्वर में उनका अभिनन्दन, स्वागत और जयजयकार कर रहे थे।

फिर भरत ने चरणपादुकाएँ रामचन्द्र को पहनाते हुये कहा, "प्रभो! मेरे पास धरोहर के रूप में रखा हुआ आपका यह सारा राज्य मैंने आज आपके चरणों में लौटा दिया है। आज मेरा जन्म सफल हो गया। आपके प्रताप से राज्य का कोष, सेना आदि सब पहले से दस गुना हो गया है।"

भरत की बात सुनकर विभीषण तथा समस्त वानरों के नेत्रों से अश्रुधारा बह चली। विमान को कुबेर के पास लौट जाने का आदेश देकर रामचन्द्रजी गुरुवर वसिष्ठ जी के पा आकर बैठ गये।

भरत ने विनयपूर्वक श्रीराम से कहा, "रघुनन्दन! अब सबकी यह इच्छा है कि सब लोग आपका शीघ्र से शीघ्र राज्याभिषेक देखें। जब तक नक्षत्रमण्डल घूमता रहे और जब तक यह पृथ्वी स्थित है, तब तक आप इस संसार के स्वामी बने रहें। अब आप इस वनवासी के वेश का परित्याग कर राजसी वेश धारण करें। भरत के प्रेमभरे शब्द सुनकर रघुनाथजी ने 'तथास्तु' कहा और तत्काल राज्याभिषेक की तैयारियाँ होने लगीं। सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, समस्त रानियाँ, विभीषण, सुग्रीव तथा अन्य वानरों ने भी सुन्दर वस्त्राभूषण धारण किये। राजसी वेश धारणकर रामचन्द्रजी नगर की ओर चले। भरत सारथी बनकर उनका रथ चलारहे थे, शत्रुघ्न ने छत्र लगा रखा था, लक्ष्मण रामचन्द्रजी के मस्तक पर चँवर डुला रहे थे। एक ओर लक्ष्मण और दूसरी ओर विभीषण खड़े थे। उन्होंने श्‍वेत चँवर हाथ में ले रखे थे। वानरराज सुग्रीव शत्रुंजय नामक गज पर सवार थे। समस्त नगरवासियों ने जयजयकार किया और श्रेष्ठियों ने आगे बढ़कर उन्हें बधाई दी। फिर पुरवासी उनके पीछे-पीछे चलने लगे।

श्रीराम के अभिषेक के लिये चारों समुद्रों और समस्त पवित्र सरिताओं का जल मँगवाया गया। वसिष्ठ जी ने सीता सहित श्रीराम को रत्‍नजटित चौकी पर बिठाया। फिर वसिष्ठ, वामदेव, जावालि, काश्यप, कात्यायन, सुयज्ञ गौतम और विजय ने उनका अभिषेक किया। फिर अन्य मन्त्रियों, सेनापतियों, श्रेष्ठियों आदि ने उनका अभिषेक किया। उस समय श्रीराम ने ब्राह्मण को गौएँ, स्वर्ण मुद्राएँ, बहुमूल्य आभूषण तथा वस्त्रादि बाँटे। फिर उन्होंने विभीषण, सुग्रीव, अंगद तथा अन्य वानरों को भी उपहार दिये। सीता जी ने अपने गले का हार उतारकर स्नेहपूर्वक पवनपुत्र को दिया। फिर सभी वानरादि विदा होकर अपने-अपने स्थानों को चले गये।

राज्य करते हुये राजा रामचन्द्र ने सौ अश्‍वमेघ यज्ञ तथा पौण्डरी एवं वाजपेय यज्ञ किये। रामराज्य में चोरी, दुराचरण, वैधव्य, बाल-मृत्यु आदि की घटनाएँ कभी नहीं हुईं। सारी प्रजा धर्म में रत रहती थी। इस प्रकार राम ने ग्यारह हजार वर्ष तक राज्य किया।

॥वाल्मीकि रामायण लंकाण्ड समाप्त॥

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अयोध्या को प्रस्थान - युद्धकाण्ड (25)

>> Sunday, April 25, 2010

एक रात्रि विश्राम करने के पश्‍चात् श्री रामचन्द्र जी ने विभीषण को बुलाकर कहा, "हे लंकेश! मेरा वनवास का समय पूरा होने को है। अब मेरा मन भरत से मिलने के लिये उद्विग्न हो रहा है। वे मुझे स्मरण करके दुःखी हो रहे होंगे। इस लिये तुम ऐसा प्रबन्ध करो कि हम शीघ्रातिशीघ्र अयोध्या पहुँच जायें।"

यह सुनकर विभीषण ने कहा, "हे प्रभो! आप चिन्ता न करें। मैं एक ही दिन में आपको अयोध्यापुरी पहुँचा दूँगा। वैसे मेरी इच्छा यह थी कि आप कुछ दिन यहाँ रुक कर मेरा आतिथ्य स्वीकार करते।"

जब श्रीरामचन्द्रजी ने वहाँ ठहरने में अपनी असमर्थता दिखाई तो विभीषण ने तत्काल पुष्पक विमान मँगाया, जो स्वर्ण से बना हुआ और नाना प्रकार के रत्नों से सुसज्जित था। रामचन्द्रजी सब वानरों का उनके द्वारा की गई सहायता के लिये आभार प्रकट करके सीता और लक्ष्मण के साथ विमान पर सवार हुये। सुग्रीव सहित सब वानरों और विभीषण ने भी उनके साथ अयोध्या चलने का आग्रह किया तो उन्होंने कृपा करके सबको उसी विमान पर अपने साथ ले लिया। विमान आकाश में उड़ने लगा। रामचन्द्र सीता को लंका, सागर, सुवर्णमय पर्वत हिरण्यनाभ, सेतुबंध, किष्किन्धा नगरी को दिखाकर उनका महत्व बताने लगे। बीच-बीच में सीता-हरण के पश्‍चात् की घटनाओं का भी विशद वर्णन करते जाते थे। जब विमान किष्किन्धा नगरी पहुँचा तो वैदेही ने सुग्रीव की भार्या तारा आदि को भी अपने साथ अयोध्या ले चलने का आग्रह किया।

रघुनाथजी ने विमान को वहाँ रुकवाकर सुग्रीव तथा अन्य यूथपतियों से कहा कि वे शीघ्र अपने-अपने परिजनों को, जो अयोध्या चलने के लिये उत्सुक हों, जाकर ले आयें। श्रीराम की आज्ञा पाते ही वे सब अपने परिजनों को बुला लाये। फिर विमान अपने गन्तव्य की ओर चल पड़ा। विमान चलते ही रामचन्द्र ने सीता को ऋष्यमूक पर्वत दिखाया जहाँ उन्होंने सुग्रीव से भेंट की थी। फिर उन्होंने शबरी की कथा सुनाते हुये पम्पा दिखाया। जटायु के मरने का स्थान, महात्मा सुतीक्ष्ण तथा शरभ के आश्रम, श्रृंगवेपुर आदि दिखाते हुये भरद्वाज मुनि के आश्रम पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने विमान उतारा।

भरद्वाज मुनि के आश्रम में पहुँचकर उन्होंने मुनि को सादर प्रणाम किया और कुशलक्षेम के पश्‍चात् अयोध्यापुरी, भरत तथा माताओं के विषय में सूचनाएँ प्राप्‍त कीं। फिर उन्होंने हनुमान से कहा, "वानरराज! मैं चाहता हूँ कि मेरे अयोध्या पहुँचने से पहले तुम अयोध्या जाकर पता लगाओ कि राजभवन में सब कुशल से तो हैं। तुम श्रृंगवेरपुर पहुँचकर वनवासी निषादराज से भी भेंट करो। उनसे तुम्हें अयोध्या का मार्ग भी ज्ञात हो जायेगा। भरत से मिलकर उन्हें हमारा कुशल समाचार देना और यहाँ हुई समस्त घटनाओं से उन्हें अवगत कराना। उन्हें यह भी बता देना कि हम लोग सफलमनोरथ होकर राक्षसराज विभीषण, वानरराज सुग्रीव तथा अन्य मित्रों के साथ प्रयागराज तक आ पहुँचे हैं। साथ ही भरत की मुखमुद्रा का भी सूक्ष्म अध्ययन करना। यदि उन्हें हमारा आगमन अरुचिकर प्रतीत हो तो मुझे सूचित करना। ऐसी दशा में हम अयोध्या से दूर रहकर तपस्वी जीवन व्यतीत करेंगे। तुम शीघ्र जाकर उन्हें सब बातों की सूचना दो।"

प्रभु की आज्ञा पाकर हनुमान मनुष्य का रूप धारणकर तीव्रगति से अयोध्या की ओर चल पड़े। पहले वे गंगा और यमुना के संगम को परकर श्रृंगवेरपुर पहुँचे और वहीं निषादराज गुह से मिले। उन्हें श्रीराम का कुशल समाचार देकर वे परशुराम तीर्थ, वालुकिनी नदी, वरूथी, गोमती आदि नदियों को पार करते हुये नन्दिग्राम जा पहुँचे। अयोध्या से एक कोस की दूरी पर उन्होंने चीर वस्त्र और काला मृगचर्म धारण किये हुये दुर्बल भरत को देखा। वे तपस्यारत ब्रह्मर्षि के सद‍ृश दिखाई दे रहे थे। भरत जी के पास पहुँचकर पवनपुत्र हनुमान ने दोनों हाथ जोड़कर उनसे निवेदन किाय, "देव! श्रीरघुनाथजी ने आपको अपना कुशल समाचार कहलाया है और आपका कुशल समाचार पूछा है। आप इस अत्यन्त दारुण शोक का परित्याग करें। आप शीघ्र ही श्रीराम से मिलेंगे।"

यह शुभ समाचार सुनकर भरत का हृदय हर्ष से भर उठा। उन्होंने बड़े उत्साह से पवनपुत्र को प्रमपूर्वक अपने हृदय से लगा लिया और बोले, "भैया! तुमने जो मुझे यह प्रिय संवाद सुनाया है इसके बदले में मैं तुम्हें क्या दूँ। मुझे कोई ऐसी वस्तु दिखाई नहीं देती जो तुम्हारी इस शुभ सूचना का उचित उपहार हो सके। फिर भी मैं तुम्हें इसके लिये सौ उत्तम गाँव, एक लाख गौएँ और उत्तम आचार वाली स्वर्ण, रत्‍न तथा आभूषणों से सुसज्जित सोलह कुलीन कुमारी कन्याएँ पत्‍नीरूप में समर्पित करता हूँ।"

फिर बोले, "सौम्य! मुझे यह बताओ कि श्रीरघुनाथजी का और वानरों का मेल-मिलाप कैसे हुआ?" भरत के इस प्रश्‍न के उत्तर में हनुमान ने श्रीराम के वनवास से लेकर दण्डकारण्य में प्रवेश करके विराध को मारने, शरभंग मुनि के स्वर्ग सिधारने, खर-दूषण तथा त्रिशरा को मारने, सीताहरण, गिद्धराज जटायु की मृत्यु, सीता की खोज करते हुये सुग्रीव से भेंट होने का विवरण सुनाकर उन्होंने सीता की खोज करने, सागर पर पुल बाँधने तथा सपरिवार रावण को मारकर वैदेही को मुक्‍त कराने तक का वृतान्त सुना डाला। यह भी बता दिया कि अब रामचन्द्रजी पुष्पक विमान से अयोध्या आ रहे हैं।

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भरत का अयोध्या लौटना - अयोध्याकाण्ड (24)

>> Monday, November 2, 2009

अयोध्या के अत्यन्त चतुर मन्त्री जाबालि ने कहा, "हे रामचन्द्र! सारे नाते मिथ्या हैं। संसार में कौन किसका बन्धु है? जीव अकेला ही जन्म लेता है और अकेला ही नष्ट होता है। सत्य तो यह है कि इस संसार में कोई किसी का सम्बन्धी नहीं होता। सम्बन्धों के मायाजाल में फँसकर स्वयं को विनष्ट करना बुद्धिमानी नहीं है। आप पितृऋण के मिथ्या विचार को त्याग दें और राज्य को स्वीकार करें। स्वर्ग-नर्क, परलोक, कर्मों का फल आदि सब काल्पनिक बातें हैं। जो प्रत्यक्ष है, वही सत्य है। परलोक की मिथ्या कल्पना से स्वयं को कष्ट देना आपके लिये उचित नहीं है।"
राम ने भरत को हृदय से लगा लिया और कहा, "भैया भरत! तुम तो अत्यंत नीतिवान हो। क्या तुम समझते हो कि मुझे राज्य के निमित्त पिता के वचनों को भंग कर देना चाहिये? क्या धर्म से पतित होना उचित है? जो कुछ भी हुआ उसमें तुम्हारा कोई भी दोष नहीं है। तुम्हें दुःखी और लज्जित होने की किंचित मात्र भी आवश्यकता नहीं है। माता कैकेयी की निन्दा करना भी उचित नहीं है क्योंकि उन्होंने पिताजी की अनुमति से ही वर माँगे थे। मेरे लिये माता कैकेयी और माता कौसल्या दोनों ही समान रूप से सम्माननीय हैं। तुम्हें ज्ञात है कि मैं पिताजी की आज्ञा का उल्लंघन कदापि नहीं कर सकता। पिताजी ने स्वयं ही तुम्हें राज्य राज्य प्रदान किया है, अतः उसे ग्रहण करना तुम्हारा कर्तव्य है। पिताजी के परलोक सिधार जाने का मुझे अत्यंत दुःख है। मुझ अभागे को उन्होंने अपनी सेवा, अन्तिम दर्शन और दाह संस्कार के अवसर से वंचित कर दिया।"

कहते-कहते राम के नेत्रों से अश्रुधारा बह चली।

फिर उन्होंने सीता से जाकर कहा, "प्रिये! पूज्य पिताजी स्वर्गलोक सिधार गये।"

तत्पश्चात् लक्ष्मण को संबोधित करते हुये बोले, "भैया! अभी-अभी मुझे यह समाचार भरत से प्राप्त हुआ है कि हम पितृविहीन हो गये हैं।"

इस सूचना को सुनते ही सीता और लक्ष्मण बिलख-बिलख कर रो पड़े।

इसके पश्चात् राम ने प्रयासपूर्वक धैर्य धारण किया और सीता तथा लक्ष्मण के साथ मन्दाकिनी के तट पर जाकर पिता को जलांजलि दी। वक्कल चीर धारण किया, हंगुदी के गूदे का पिण्ड बनाया और उस पिण्ड को कुशा पर रख कर उनका तर्पण किया। पिण्डदान तथा स्नानादि से निवृत होने के पश्चात् वे अपनी कुटिया में लौटे और भाइयों को भुजाओं में भर कर रोने लगे।

उनके आर्तनाद को सुनकर गुरु वसिष्ठ तथा सभी रानियाँ वहाँ आ पहुँचीं। विलाप करने में वे रानियाँ भी सम्मिलित हो गईं। फिर प्रयासपूर्वक धैर्य धारण करके राम, लक्ष्मण और सीता ने सब रानियों एवं गुरु वसिष्ठ के चरणों की वन्दना की। कुछ काल पश्चात् सभी लोग रामचन्द्र को घेर कर बैठ गये और महाराज दशरथ के विषय में चर्चा करने लगे। इस प्रकार वह रात्रि व्यतीत हो गई।

प्रातःकाल संध्या-उपासना आदि से निवृत होकर, राजगुरु तथा मन्त्रीगण को साथ लेकर, भरत राम के पास आये और बोले, "हे रघुकुलशिरोमणि! प्रतिज्ञाबद्ध होने के कारण पिताजी ने अयोध्या का राज्य मुझे प्रदान किया था। उस राज्य को अब मैं आपको समर्पित करता हूँ। कृपा करके आप इसे स्वीकार करें।"

राम ने कहा, "भरत! मैं जानता हूँ कि पिता की मृत्यु और मेरे वनवास से तुम अत्यंत दुःखी हो। किन्तु विधि के विधान को भला कौन टाल सकता है। किसी को भी इसके लिये दोष देने की आवश्यकता भी नहीं है। संयोग के साथ वियोग का और जन्म के साथ मृत्यु का सम्बन्ध तो सदा से ही चला आया है। हमारे पिता सहस्त्रों यज्ञ, दान तप आदि करने के पश्चात् ही स्वर्ग सिधारे हैं। इसलिये उनके लिये शोक करना व्यर्थ है। तुम्हें पिताजी की आज्ञा मानकर अयोध्या का राज्य करना चाहिये और मुझे भी उनकी आज्ञा का पालन करते हुये वन में निवास करना चाहिये। ऐसा न करने से मुझे और तुम्हें दोनों को ही नरक की यातना भुगतनी पड़ेगी।"

राम के ये तर्कपूर्ण वचन अकाट्य थे।

इन वचनों को सुनकर भरत ने हाथ जोड़कर कहा, "हे आर्य! इस दुर्घटना के समय मैं अपने नाना के घर में था। मेरी माता की मूर्खता के कारण ही यह सारा अनिष्ट हुआ। मैं भी धर्माधर्म का कुछ ज्ञान रखता हूँ इसीलिये मैं आपके अधिकार का अपहरण कदापि नहीं कर सकता। आप क्षत्रिय हैं और क्षत्रिय का धर्म जटा धारण करके तपस्वी बनना नहीं अपितु प्रजा का पालन करना है। आपसे आयु, ज्ञान, विद्या आदि सभी में छोटा होते हुये भी मैं सिंहासन पर कैसे बैठ सकता हूँ? इसीलिये आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप राजसिंहासन पर बैठकर मेरे माता को लोक निन्दा से और पिताजी को पाप से बचाइये अन्यथा मुझे भी वन में रहने की अनुमति दीजिये।"

रामचन्द्र ने भरत को फिर से समझाते हुये कहा, "पिताजी ने तुम्हें राज्य प्रदान किया है और मुझे चौदह वर्ष के लिये वनवास की आज्ञा दी है। जिस प्रकार मैं उनके वचनों पर श्रद्धा रखकर उनकी आज्ञा का पालन कर रहा हूँ, उसी प्रकार तुम भी उनकी आज्ञा को अकाट्य मानकर अयोध्या पर शासन करो। उनके वचनों की यदि हम अवहेलना करेंगे तो उनकी आत्मा को क्लेश पहुँचेगा। तुम्हें राजकार्य में समुचित सहायता देने के लिये शत्रुघ्न तुम्हारे साथ हैं ही। पिताजी को अपनी प्रतिज्ञा के ऋण से मुक्ति दिलाना हम चारों भाइयों का कर्तव्य है।"

रामचन्द्र के वचनों को सुनकर अयोध्या के अत्यन्त चतुर मन्त्री जाबालि ने कहा, "हे रामचन्द्र! सारे नाते मिथ्या हैं। संसार में कौन किसका बन्धु है? जीव अकेला ही जन्म लेता है और अकेला ही नष्ट होता है। सत्य तो यह है कि इस संसार में कोई किसी का सम्बन्धी नहीं होता। सम्बन्धों के मायाजाल में फँसकर स्वयं को विनष्ट करना बुद्धिमानी नहीं है। आप पितृऋण के मिथ्या विचार को त्याग दें और राज्य को स्वीकार करें। स्वर्ग-नर्क, परलोक, कर्मों का फल आदि सब काल्पनिक बातें हैं। जो प्रत्यक्ष है, वही सत्य है। परलोक की मिथ्या कल्पना से स्वयं को कष्ट देना आपके लिये उचित नहीं है।"

जाबालि के इस प्रकार कहने पर राम बोले, "मन्त्रिवर! आपके ये नास्तिक विचार मेरे हित के लिये उचित नहीं हैं वरन ये मेरे लिये अहितकारी है। मैं सदाचार और सच्चरित्रता को अत्यधिक महत्व देता हूँ। यदि राजा ही सत्य के मार्ग से विचलित होगा तो प्रजा भी उसका ही अनुसरण करेगी और कुपथगामी हो जायेगी। मैं आपके इस अनुचित मन्त्रणा को स्वीकार करने में असमर्थ हूँ। मुझे तो आश्चर्य के साथ ही साथ दुःख इस बात का है कि परम आस्तिक तथा धर्मपरायण पिताजी ने आप जैसे नास्तिक व्यक्ति को मन्त्रीपद कैसे प्रदान किया।"

राम के इन रोषपूर्ण वचनों को सुनकर जाबालि ने कहा, "राघव! मैं नास्तिक नहीं हूँ। भरत के बारम्बार किये गये आग्रह को आपके द्वारा अस्वीकार करने के कारण ही मैंने ये बाते कहीं थीं। मेरा उद्देश्य केवल आपको लौटा ले जाना ही था। आपको लौटा ले जाने के लिये मेरी मन्द बुद्धि में इन बातों के अतिरिक्त और कोई उपाय ही नहीं सूझा।"

किसी भी प्रकार से राम ने भरत की प्रार्थना को स्वीकार नहीं किया।

विवश होकर भरत ने हाथ जोड़कर कहा, "हे तात! मैंने अटल प्रतिज्ञा की है कि मैं आपके राज्य को ग्रहण नहीं करूँगा। यदि आप पिताजी की आज्ञा का पालन ही करना चाहते हैं तो अपने स्थान पर मुझे वन में रहने की अनुमति दीजिये। आपके बदले मेरे वन में रहने से भी पिता को माता के ऋण से मुक्ति मिल जायेगी।"

इन स्नेहपूर्ण वचनों को सुनकर राम मन्त्रियों और पुरवासियों की ओर देखकर बोले, "जो कुछ भी हो चुका है उसे न तो मैं बदल सकता हूँ और न ही भरत। वनवास की आज्ञा मुझे हुई है, न कि भरत को। मैं माता कैकेयी के कथन और पिताजी के कर्म दोनों को ही उचित समझता हूँ। मातृभक्त, पितृभक्त और गुरुभक्त होने के साथ ही साथ भरत सर्वगुण सम्पन्न भी हैं। अतः उनका ही राज्य करना उचित है।"

जब राम किसी भी प्रकार से अयोध्या लौटने के लिये राजी नहीं हुए तो भरत ने रोते हुये कहा, "भैया! मैं जानता हूँ कि आपकी प्रतिज्ञा अटल है, किन्तु यह भी सत्य है कि अयोध्या का राज्य भी आप ही का है। अतः आप अपनी चरण पादुकाएँ मुझे प्रदान करें। मैं इन्हें अयोध्या के राजसिंहासन पर प्रतिष्ठित करूँगा और स्वयं, वक्कल धारण करके ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए, नगर के बाहर रहकर आपके सेवक के रूप में राजकाज चलाउँगा। चौदह वर्ष पूर्ण होते ही यदि आप अयोध्या नहीं पहुँचे तो मैं स्वयं को अग्नि में भस्म कर दूँगा। यही मेरी प्रतिज्ञा है।"

रामचन्द्र जी ने भरत को हृदय से लगाकर उन्हें अपनी पादुकाएँ दे दीं। फिर शत्रुघ्न को समझाते हुये बोले, "भैया! माता कैकेयी को कभी अपशब्द कहकर उनका अपमान मत करना। इस बात को कभी न भूलना कि वे हम सबकी पूज्य माता हैं। तुम्हें मेरी और सीता की शपथ है।"

फिर माताओं को धैर्य बँधा कर सम्मानपूर्वक सबको विदा किया।

श्री राम की चरण पादुकाओं के साथ भरत और शत्रुघ्न रथ पर सवार हुये। उनके पीछे अन्य अनेक रथों पर माताएँ, गुरु, पुरोहित, मन्त्रीगण तथा अन्य पुरवासी चले। सबसे पीछे सेना चली। उदास मन लिये हुए सब लोग तीन दिन में अयोध्या पहुँचे।

अयोध्या पहुँच जाने पर भरत ने गुरु वसिष्ठ से कहा, "गुरुदेव! आपको तो ज्ञात ही हैं कि अयोध्या के वास्तविक नरेश राम हैं। उनकी अनुपस्थिति में उनकी चरण पादुकाएँ सिंहासन की शोभा बढ़ायेंगी। मैं नगर से दूर नन्दिग्राम में पर्णकुटी बनाकर निवास करूँगा और वहीं से राजकाज का संचालन करूँगा।"

फिर वे नन्दिग्राम से ही राम के प्रतिनिधि के रूप में राज्य का कार्य संपादन करने लगे।

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राम-भरत मिलाप - अयोध्याकाण्ड (23)

>> Sunday, November 1, 2009

अनेक प्राकृतिक शोभा वाले दर्शनीय स्थल चित्रकूट पर्वत पर स्थित थे अतः चित्रकूट में निवास करते हुये राम उन दर्शनीय स्थलों का सीता को घूम-घूम कर उनका दर्शन कराने लगे। भाँति-भाँति की बोली बोलने वाले पक्षियों, नयनाभिराम पर्वतमालाओं तथा उनकी शिखरों, विभिन्न प्रकार के फलों से लदे हुये वृक्षों को देखकर सीता अत्यन्त प्रसन्न हुईं। ऐसे ही जब एक दिन राम प्राकृतिक छटा का आनन्द ले रहे थे तो सहसा उन्हें चतुरंगिणी सेना का कोलाहल सुनाई पड़ा और वन्य पशु इधर-उधर भागते हुए दृष्टिगत हुए। इस पर राम लक्ष्मण से बोले, "हे सुमित्रानन्दन! ऐसा प्रतीत होता है कि इस वन-प्रदेश में वन्य पशुओं के आखेट हेतु किसी राजा या राजकुमार का आगमन हुआ है। हे वीर! तुम जाकर इसका पता लगओ।"

लक्ष्मण तत्काल एक ऊँचे साल वृक्ष पर चढ़ गये और इधर-उधर दृष्टि दौड़ाने लगे। उन्होंने देखा, उत्तर दिशा से एक विशाल सेना हाथी घोड़ों और अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित सैनिकों के साथ चली आ रही है जिसके आगे-आगे अयोध्या की पताका लहरा रही थी। तत्काल ही लक्ष्मण समझ गये कि वह अयोध्या की सेना है।

राम के पास आकर क्रोध से काँपते हुये लक्ष्मण ने कहा, "भैया! कैकेयी का पुत्र भरत सेना लेकर चला आ रहा है। अवश्य ही वह वन में अकेला पाकर हम लोगो का वध कर देना चाहता है ताकि निष्कंटक होकर अयोध्या का राज्य कर सके। आज मैं इस षड़यन्त्रकारी भरत को उसके पापों का फल चखाउँगा। भैया! चलिये, कवचों से सुसज्जित होकर पर्वत की चोटी पर चलें।"

राम बोले, "सौमित्र! तुम ये कैसी बातें कर रहे हो? धनुष तान कर खड़े होने की कोई आवश्यकता नही है। भरत तो मुझे प्राणों से भी प्यारा है। भला भाई का स्वागत अस्त्र-शस्त्रों से किया जाता है? अवश्य ही वह मुझे अयोध्या लौटा ले जाने के लिये आया होगा। भरत में और मुझमें कोई अंतर नहीं है, इसलिये तुमने जो कठोर शब्द भरत के लिये कहे हैं, वे वास्तव में मेरे लिये कहे हैं। स्मरण रखो, किसी भी स्थिति में पुत्र पिता के और भाई-भाई के प्राण नहीं लेता।"

राम के भर्त्सना भरे शब्द सुनकर लक्ष्मण बोले, "हे प्रभो! सेना में पिताजी का श्वेत छत्र के नहीं है। इसी कारण ही मुझे यह आशंका हुई थी। मुझे क्षमा करें।"

पर्वत के निकट अपनी सेना को छोड़कर भरत-शत्रुघ्न राम की कुटिया की ओर चले। उन्होंने देखा, यज्ञवेदी के पास मृगछाला पर जटाधारी राम वक्कल धारण किये बैठे हैं। वे दौड़कर रोते हुये राम के पास पहुँचे। उनके मुख से केवल 'हे आर्य' शब्द निकल सका और वे राम के चरणों में गिर पड़े। शत्रुघ्न की भी यही दशा थी।

राम ने दोनों भाइयों को पृथ्वी से उठाकर हृदय से लगा लिया और पूछा, "भैया! पिताजी तथा माताएँ कुशल से हैं न? कुलगुरु वसिष्ठ कैसे हैं? तुमने तपस्वियों जैसा वक्कल क्यों धारण कर रखा है?"

रामचन्द्र के वचन सुनकर अश्रुपूरित भरत बोले, "भैया! हमारे परम तेजस्वी धर्मपरायण पिता स्वर्ग सिधार गये। मेरी दुष्टा माता ने जो पाप किया है, उसके कारण मुझ पर भारी कलंक लगा है और मैं किसी को अपना मुख नहीं दिखा सकता। अब मैं आपकी शरण में आया हूँ। आप अयोध्या का राज्य सँभाल कर मेरा उद्धार कीजिये। सम्पूर्ण मन्त्रिमण्डल, तीनों माताएँ, गुरु वसिष्ठ आदि सब यही प्रार्थना लेकर आपके पासे आये हैं। मैं आपका छोटा भाई हूँ, पुत्र के समान हूँ, माता के द्वारा मुझ पर लगाये गये कलंक को धोकर मेरी रक्षा करें।"

इतना कहकर भरत रोते हुये फिर राम के चरणों पर गिर गये और बार-बार अयोध्या लौटने के लिये अनुनय विनय करने लगे।

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दशरथ की अन्त्येष्टि - अयोध्याकाण्ड (22)

दूसरे दिन प्रातःकाल गुरु वसिष्ठ ने शोकाकुल भरत को धैर्य बंधाते हुये महाराज दशरथ की अन्त्येष्टि करने के लिये प्रेरित किया। राजगुरु की आज्ञा का पालन करने के लिये प्रयास करके भरत ने हृदय में साहस जुटाया और अपने स्वर्गीय पिता का प्रेतकर्म प्रारम्भ किया। तैलकुण्ड में रखे गये शव को निकाल कर अर्थी पर लिटाया गया। अर्थी पर पिता का शव देखकर भरत का हृदय चीत्कार कर उठा। रो-रो कर वे कहने लगे, "हा पिताजी! आप मुझे छोड़ कर चले गये। आपने तनिक भी विचार नहीं किया कि अनाथ होकर मैं किसके आश्रय में जियूँगा। आप मुझसे बात नहीं कर रहे हैं क्योंकि आप मुझे दोषी समझते हैं। आप स्वर्ग सिधार गये, भैया राम वन को चले गये, अब इस अयोध्या का राज्य कौन सँभालेगा?"

भरत को इस प्रकार विलाप करते हुये देख महर्षि वसिष्ठ ने कहा, "वत्स! अब शोक त्यागकर महाराज का प्रेतकर्म आरम्भ करो।"

उनके ऐसा आदेश देने पर भरत ने अर्थी को रत्नों से सुसज्जित कर ऋत्विज पुरोहितों तथा आचार्यों के निर्देशानुसार अग्निहोत्र किया। भरत, शत्रुघ्न और वरिष्ठ मन्त्रीगण अर्थी को कंधे पर उठाकर श्मशान की ओर चले। रोती-बिलखती प्रजा भी शवयात्रा में पीछे-पीछे चलने लगी। अर्थी के आगे निर्धनों के लिये सोना, चाँदी, रत्न आदि लुटाये जा रहे थे। सरयू तट पर चन्दन, गुग्गुल आदि से चिता बनाया गया और शव को उस पर लिटाया गया। सभी रानियाँ विलाप करके रोने लगीं। भरत ने चिता में अग्नि प्रज्वलित किया और सत्यपरायण महात्मा दशरथ का नश्वर शरीर का पंचभूत में विलय हो गया।

तेरहवें दिन जब भरत अपने पिता के अंतिम संस्कार से निवृत हुये तो मन्त्रियों ने उनसे निवेदन करते हुये कहा, "हे रघुकुल भूषण! दिवंगत महाराज आपको राजा बना गये हैं इसलिये अब आप न्यायपूर्वक हमारे राजा हैं। अतः अब आप सिंहासनारूढ़ होने की कृपा करें।"

इस पर भरत बोले, "सदा से रघुकुल की रीति रही है कि पिता के स्थान पर ज्येष्ठ पुत्र ही राजा होता है। इसलिये इस सिंहासन पर मेरा कोई अधिकार नहीं है, इस पर केवल धर्मात्मा राम का ही अधिकार है। मैंने निश्चय किया है कि मैं वन से राम को लौटा लाउँगा उनके स्थान पर मैं स्वयं चौदह वर्ष पर्यंत वन में रहूँगा। अतः आप सभी तत्काल, भैया राम को वापस लाने के लिये, वन में जाने की तैयारी करें।"

भरत के इस कथन ने सबमें एक नया उत्साह उत्पन्न कर दिया। उनके मन में राम के लौटने की आशा प्रबल होने लगी।

समस्त तैयारियाँ पूर्ण होने पर भरत, शत्रुघ्न, तीनों माताएँ, मन्त्रीगण, दरबारी आदि, चतुरंगिणी सेना के साथ, वन की ओर चले। प्रजाजन उत्साह में भर कर राम और भरत की जय-जयकार करते जाते थे।राजा गुह के नगर श्रंगवेरपुर के निकट गंगा तट पर उन्होंने अपना पड़ाव डाला।

विशाल सेना के साथ भरत के आने का समाचार निषादराज गुह तक भी पहुँचा। उन्होंने अपने सेनापतियों को बुलाकर कहा, "सेनापतियों! आप लोगों को अच्छी प्रकार से विदित है कि रामचन्द्र हमारे मित्र हैं। हमें ज्ञात नहीं है कि भरत किस उद्देश्य से सेना लेकर आये हैं। अतः अपनी सेना को तुम लोग सतर्क करके इधर उधर छिपा दो। पाँच सौ नावों में सौ-सौ अस्त्र शस्त्रधारी सैनिक भी तैयार रहें। यदि भरत राम के पास निष्कपट भाव से जाना चाहे तो जाने दो, अन्यथा उन सबको मार्ग में ही मृत्यु के मुख में पहुँचा दो।"

इस प्रकार से सेनापतियों को सावधान करने के पश्चात् वे स्वागत की सामग्री ले भरत के पास पहुँचे और बोले, "हे राघव! बिना किसी पूर्व सूचना के आपके यहाँ पहुँच जाने के कारण मैं आपके यथोचित सत्कार व्यवस्था नहीं कर पाया। मैं इसके लिये क्षमाप्रार्थी हूँ। आपसे निवेदन है कि रात्रि विश्राम यहीं करें और हमारा रूखा सूखा भोजन स्वीकार कर करके हमें धन्य करें।"

गुह के प्रेमयुक्त वचनों को सुनकर भरत ने कहा, "हे निषादराज! मैं ऋषि भरद्वाज के आश्रम में जाना चाहता हूँ, क्योंकि भैया राम वहीं गये हैं। आपकी मुझ पर बड़ी कृपा होगी यदि आप मुझे कुछ पथप्रदर्शक प्रदान करें।"

निषादराज बोले, "प्रभो! आप चिन्ता न करें। मैं और मेरे सैनिक आपका पथप्रदर्शन करेंगे। किन्तु आप इतनी विशाल सेना को साथ लेकर रामचन्द्र के पास क्यों जा रहे हैं?"

निषाद के हृदय की शंका का अनुमान कर भरत बोले, "निषादराज! मैं भैया राम को वन से लौटाकर उनका राज्य उन्हें सौंपना चाहता हूँ क्योंकि वे मेरे बड़े भाई और पिता के तुल्य हैं। मेरे इस कार्य के लिये मेरी माताएँ और मन्त्री आदि भी मेरा साथ दे रहे हैं।"

भरत के वचन सुनकर गुह को संतोष हुआ। समस्त जनों सहित भरत ने वहीं रात्रि-विश्राम किया। प्रातःकाल गुहराज की आज्ञा से गंगा के किनारे पर सैंकड़ों नौकाओं का प्रबन्ध कर दिया गया और उनमें सवार हो कर सब गंगा पार उतर गये।

वे सभी महर्षि भरद्वाज के आश्रम में पहुँचे। उनका यथोचित सत्कार करने के पश्चात् महामुनि ने भरत से वन में आगमन का कारण पूछा।

भरत ने हाथ जोड़कर कहा, "महामुने! मैं अपने भैया राम का दास हूँ। मेरी माता कैकेयी ने जो कुछ किया है मैं उसके सर्वथा विरुद्ध हूँ। मैं भैया राम के पास जाकर उनसे क्षमा याचना करना चाहता हूँ। मैं उनसे अयोध्या लौटने की प्रार्थना करना चाहता हूँ कि वे वापस लौटकर अपना राज्य सँभाले।"

भरत की बात सुनकर मुनि बोले, "भरत! तुम वास्तव में महान हो। मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि तुम तीनों लोकों में यशस्वी होओ। आजकल राम सीता और लक्ष्मण के साथ चित्रकूट में निवास करते हैं। तुम कल प्रातः वहाँ चले जाना। आज की रात्रि यहीं विश्राम करो।"

प्रातःकाल जब चित्रकूट जाने के लिये भरत मुनि भरद्वाज से अनुमति लेने पहुँचे तो उन्होंने भरत को समझाते हुये कहा, "भरत! तुम अपनी माता के प्रति दुराग्रह न रखना, इसमें उनका कोई दोष नहीं है। कैकेयी द्वारा किये गये कार्य में परमात्मा की प्रेरणा है ताकि वन में असुरों और राक्षसों का राम के हाथों विनाश हो सके।"

भरत अपनी माताओं एवं समस्त साथियों के साथ महर्षि से विदा लेकर चले और मन्दाकिनी के तट पर पहुँचे। वहाँ ठहरकर भरत ने मन्त्रियों से कहा, "प्रतीत होता है कि भैया की कुटिया यहाँ कहीं निकट ही है। सेना को साथ लेकर आगे जाने से यहाँ बसे हुये आश्रमवासियों की शान्ति और तपस्या में बाधा पड़ेगी। इसलिय आगे मैं सेना के साथ नहीं जाना चाहता। अतः तुम गुप्तचरों को भेजकर राम की कुटिया का पता लगवाओ।"

मन्त्रियों की आज्ञा पाकर चतुर गुप्तचर इस कार्य के लिये चल पड़े।

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भरत-शत्रुघ्न की वापसी - अयोध्याकाण्ड (21)

>> Saturday, October 31, 2009

गत रात्रि के स्वप्न और इस प्रकार दूतों के आगमन ने भरत के मन में उठने वाले अनिष्ट की आशंका को और प्रबल कर दिया। किन्तु उनके बार बार पूछने पर भी दूतों ने किसी भी अशुभ समाचार के विषय में कुछ नहीं बताया। भरत तथा शत्रुघ्न ने शीघ्रता पूर्वक महाराज कैकेय से विदा लिया और दूतों के साथ अयोध्या की ओर प्रस्थान किया। अनेक नदियों तथा दुर्गम घाटियों को पार करके भरत अयोध्या की सीमा में प्रविष्ट हुये। वहाँ का दृष्य देखकर वे बोले, "हे दूत! अयोध्या की ये वाटिकाएँ जन-शून्य क्यों हैं? नगर में प्रतिदिन होने वाले प्रजाजनों का तुमुलनाद क्यों सुनाई नहीं दे रहा है? ऐस क्यों प्रतीत हो रहा है जैसे आज अयोध्या श्रीहीन हो गई हो? क्या यहाँ किसी प्रकार की अवांछनीय घटना घटित हुई है?"

दूतों ने उनके इन प्रश्नों का कुछ भी उत्तर नहीं दिया। आशंकित भरत राजप्रासाद में पहुँचे। वे सबसे पहले पिता के दर्शन करने के लिये उनके भवन की ओर चले। उन्हें वहाँ न पाकर वे अपनी माता कैकेयी के कक्ष में पहुँचे। उन्हें देख कर मुस्कुराती हुई कैकेयी स्वर्ण के आसन से उठी। भरत ने माता का चरण स्पर्श किया। कैकेयी ने उन्हें हृदय से लगाकर आशीर्वाद दिया और अपनी माता और पिता के कुशल समाचार पूछा।

कैकेय की कुशलता के विषय में जान लेने के पश्चात् वह बोली, "वत्स! मार्ग में तुम्हें कोई कष्ट तो नहीं हुआ?"

उसके इस प्रश्न का कुछ भी उत्तर न देकर भरत ने पूछा, "माता, मैं पिताजी के भवन से यहाँ आ रहा हूँ। वे वहाँ नहीं थे। मुझे बताइये वे कहाँ हैं?"

तटस्थ भाव से कैकेयी ने कहा, "हे पुत्र! तुम्हारे तेजस्वी पिता स्वर्ग सिधार गये।"

कैकेयी के मुख से इन शब्दों को सुनते ही भरत के हृदय को मर्मान्तक आधात लगा। वे बिलख-बिलख कर रोने लगे। फिर वे बोले, "अचानक अचानक यह कैसे हो गया? हाय! मैं कितना अभागा हूँ कि अन्तिम समय में उनके दर्शन भी न कर सका। धन्य हैं राम-लक्ष्मण जिन्होंने अन्तिम समय में पिताजी की सुश्रूषा की। पिताजी के बाद अब भैया राम ही मेरे आश्रय एवं पूज्य हैं। वे कहाँ हैं? माता! क्या अन्तिम समय में पिताजी ने मुझे याद किया था? मेरे लिये उन्होंने क्या सन्देश दिया है?"

भरत को सान्त्वना देती हुई कैकेयी बोले, "वत्स! तुम्हारे पिताजी ने तुम्हारे लिये कुछ भी सन्देश नहीं दिया। पाँच दिवस और पाँच रात्रि तक वे हा राम! हा लक्ष्मण! हा सीता! कह कर विलाप करते रहे और विलाप करते-करते ही परलोक सिधार गये।"

यह सुनकर भरत की पीड़ा और बढ़ गई और वे बोले, "क्या पिताजी के अन्तिम समय में भैया राम भी नहीं थे? क्या पिताजी को उनके वियोग में प्राण त्यागने पड़े? वे कहाँ चले गये थे?"

कैकेयी ने मुस्कुराते हुये कहा, "तुम्हारा बड़ा भाई राम तो, लक्ष्मण और सीता के साथ वक्कल पहन कर वन को चला गया है। मैं तुम्हें पूरी बात से अवगत कराती हूँ। तुम्हारे पिता ने राम के अभिषेक का निश्चय किया था। राम के अभिषेक की बात सुन कर मैंने महाराज से दो वर माँग लिये। प्रथम वर से तुम्हारे लिये अयोध्या का राज्य माँगा और द्वितीय वर से राम के लिये चौदह वर्ष का वनवास। राम के साथ सीता और लक्ष्मण भी स्वयं अपनी इच्छा से चले गये। उनके चले जाने पर तुम्हारे पिता विलाप करते-करते मृत्यु को प्राप्त हो गये। अब यह राज्य अब तुम्हारा है। अतः शोक को त्याग दो और निष्कंटक राज्य करो। तुम्हारे विरुद्ध विद्रोह करने वाला अब इस नगर में कोई भी नहीं रह गया है। मैंने पूरी व्यवस्था कर रखी है। तुम गुरु वशिष्ठ और मन्त्रियों को बुलाओ और अपना राज्यतिलक करवाओ।"

राम-लक्ष्मण के वनवास के विषय में और पिता की मृत्यु का कारण जान कर भरत का मन व्यथा से भर गया और साथ ही साथ उनका तन क्रोध से जल उठा। वे बोले, "हे पापिन माते! तुम रघुकुल का कलंक हो। मेरे भाइयों के वनवास और पिता की मृत्यु का कारण तुम्हारी दुष्टता ही है। तुम रघुकुल का नाश करने वाली नागिन हो। हे जड़बुद्धि! तुमने राम को वन क्यों भेजा? मुझे तो प्रतीत होता है कि पिताजी की भाँति माता कौसल्या और माता सुमित्रा भी पति और पुत्र वियोग में अपने प्राण त्याग देंगीं। राम भैया तो तुम्हारा मुझसे भी अधिक सम्मान करते थे। माता कौसल्या तुम्हारे साथ सहोदर भगिनी जैसा व्यवहार करती थीं। फिर तुमने इतना बड़ा अन्याय क्यों किया? हे पाषाणहृदये माता! जिन भाइयों और भाभी ने कभी दुःख नहीं देखा उन्हें इतना कठोर दण्ड देकर तुम्हें क्या मिल गया? भैया राम के वियोग में मैं पल भर भी नहीं रह सकता। क्या तुम इतना भी नहीं जानतीं कि सद्गुणों में मैं राम के चरणों की धूलि के बराबर भी नहीं हूँ। तुमने मेरे मस्तक पर बहुत बड़ा कलंक लगा दिया। मैं इसी क्षण तुम्हारा परित्याग कर देता किंतु तुम्हारे उदर से जन्म लेने के कारण ऐसा भी नहीं कर सकता। अस्तु, मैं यदि तुम्हें नहीं त्याग सकता तो क्या हुआ, अपने प्राण तो त्याग सकता हूँ। मैं विष खा लूँगा या वनों में राम को ढूँढते हुये प्राण दे दूँगा। यह तुमने कैसे भुला दिया कि इक्ष्वाकु कुल में सदा से ज्येष्ठ पुत्र ही राज्य करता आया है? मैं अभी वन जाकर राम को वापस बुला लाउँगा और उनका सिंहासन उन्हें सौंप दूँगा।"

इतना कहकर वे शत्रुघ्न सहित रोते-रोते कौसल्या के भवन की ओर चले दिये।

भरत और शत्रुघ्न ने माता कौसल्या का चरणस्पर्श किये। उन्हें आशीर्वाद देकर कौसल्या बोली, "वत्स! यह तो अच्छी बात है कि तुम्हें राज्य प्राप्त हो गया। किन्तु निर्दोष राम को वनवास देकर तुम्हारी माता को क्या मिला? मैंने निश्चय किया है कि तुम्हारे सिंहासन सँभालने के पश्चात् मैं भी वन चली जाउँगी।"

उनके इन शब्दों को सुनकर भरत ने रोते हुये कहा, "हे माता! आप मुझे क्यों दोष देती हैं? जो कुछ भी हुआ वह मेरे अनुपस्थिति में हुआ है। भैया के वियोग में तो मेरा हृदय फटा जा रहा है। उनके बिना अयोध्या का तो क्या, यदि त्रैलोक्य का राज्य भी कोई मुझे दे तो मैं नहीं लूँगा। राम के वनगमन में यदि मेरी लेशमात्र भी सहमति हो तो मुझे रौरव नर्क मिले। इसी समय भूमि फट जाये और मैं उसमें समा जाऊँ। यदि इस दुष्ट कार्य में मेरी सहमति हो तो मुझे वह दण्ड मिले जो घृणित पाप करने वाले पापी को मिलती है।"

यह कहकर रोते हुये भरत मूर्छित होकर कौसल्या के चरणों में गिर पड़े।

जब वे कुछ चैतन्य हुये तो कौसल्या बोली, "बेटा! इस प्रकार की बातें करके तुम मुझे क्यों दुःखी करते हो? क्या मैं तुम्हें और तुम्हारे हृदय को नहीं पहचानती?" और वे भरत को नाना प्रकार से सान्त्वना देने लगीं।

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