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आदिकवि वाल्मीकि रचित संस्कृत महाकाव्य का संक्षिप्त हिंदी रूपान्तर



रावण को शूर्पणखा का धिक्कार

मारीच के पास से रावण लंका लौट आया। कुछ काल पश्चात् ही शूर्पणखा वहाँ आ पहुँची। जब वह वहाँ पहुँची तो रावण अपने मन्त्रियों से घिरा हुआ स्वर्ण के सिंहासन पर बैठा ऐसी शोभा पा रहा था जैसे स्वर्ण की वेदी में घी प्रज्वलित अग्नि। जिसने समुद्रों तथा पर्वतों पर जीत लिया है, नागराज वासुकि को परास्त किया है, तक्षक की प्रिय पत्नी का हरण किया है, कुबेर पर विजय प्राप्त कर उससे पुष्पक विमान छीना है, इन्द्रादि समस्त देवता जिससे भयभीत रहते हैं, वायु देवता जिस पर पंखा डुलाते हैं, वरुण जिसके यहाँ पानी भरता है और जो मृत्यु को भी परास्त करने की सामर्थ्य रखता है, ऐसे परमप्रतापी भाई की बहन होकर मैं नाक-कान कटवा कर अपमान का विष पियूँ, धिक्कार है ऐसी वीरता और पराक्रम पर। यह सोचते हुये उसका सम्पूर्ण शरीर क्रोध और अपमान की ज्वाला से जलने लगा। रावण के पास आ कर वह क्रोध से फुँफकारती हुई बोली, "धिक्कार है तुम पर, तुम्हारे पराक्रम पर और तुम्हारे इन मन्त्रियों पर। तुम अपनी विलासिता में डूबे हुये हो कि तुम्हें यह भी पता नहीं कि तुम्हारी ओर तुम्हारा काल बढ़ा चला आ रहा है। हे नीतिवान रावण! क्या अब मुझे तुमको यह भी बताना चाहिये कि समय पर उचित कार्य न करने वाले और अपने देश की रक्षा के प्रति असावधान रहने वाले राजा के राज्य के नष्ट हो जाने में जरा भी देर नहीं लगती। वह राजा राज्य करने योग्य नहीं होता जिसके गुप्तचर सक्रिय और सतर्क नहीं होते। गुप्तचर ही उसके नेत्र होते हैं। उनके बिना वह अंधा होता है। तुम्हारे गुप्तचर तो मूर्ख, अयोग्य और आलसी हैं। मन्त्री भी सर्वथा अयोग्य हैं। उन्हें अभी तक यह पता नहीं कि उनके राज्य दण्डकारण्य में कितनी भयंकर घटना घट चुकी है। चौदह सहस्त्र राक्षसों का मेरे वीर भ्राताओं खर-दूषण सहित संहार हो चुका है। एक विदेशी ने तुम्हारी बहन के नाक-कान काट लिये हैं। किन्तु तुम्हें और तुम्हारे मन्त्रियों को इस सबकी क्या चिन्ता है? तुम सब तो सुरा और सुन्दरियों में व्यस्त रहते हो। जो ऋषि-मुनि कल तुम्हारे नाम से थर-थर काँपते थे वे आज सिर उठा कर निर्भय हो घूम रहे हैं। तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि वृक्ष से गिरे हुये पत्ते और राज्य से च्युत राजा का कोई मूल्य नहीं होता। प्रजा उसी राजा की पूजा करती है जो आँखों से सोता और नीति से जागता है, जिसका क्रोध प्रलयंकर और प्रसन्नता सुखदायिनी है। परन्तु तुम में ये गुण हैं ही नहीं। तुम तो राम द्वारा किये गये भीषण हत्याकाण्ड से अभी तक अपरिचित हो।"

इन कटु वचनों को सुन कर रावण लज्जित होते हुये बोला, "शूर्पणखे! मैं सब जानता हूँ। केवल तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था। अब तुम राम और लक्ष्मण को मरा हुआ ही समझो। इस संसार में ऐसा कोई भी नहीं है फो तेरे नाक-कान काटने वाले को अब कोई बचा सके। मैंने भली-भाँति विचार कर लिया है कि मुझे क्या करना है। राम अवश्य ही मेरे हाथों मारा जायेगा सीता मेरे महलों की शोभा बढ़ायेगी और तेरी दासी बन कर रहेगी।"

इतना कह कर रावण ने पुनः आकाश मार्ग से मारीच के पास पहुँचा और उससे बोला, "हे मारीच! मित्र ही संकट के समय मित्र की सहायता करता है। मैं जानता हूँ कि मेरे मित्रों और शुभचिन्तकों में तुमसे बढ़ कर बलवान, नीतिवान और मुझसे सच्चा स्नेह करने वाला और कोई नहीं है। मुझे बहन शूर्पणखा की दशा देख कर बहुत दुःख हुआ है। उन दुष्टों ने यह भी नहीं सोचा कि एक स्त्री पर हाथ नहीं उठाना चाहिये। उन कायरों को अवश्य दण्ड देना होगा। यह नाक शूर्पणखा की नहीं, सम्पूर्ण राक्षस जाति की कटी है। इस अपमान से तो मर जाना ही अच्छा है। अतः हे मारीच! उठो और सम्पूर्ण राक्षस जाति की इस अपमान से रक्षा करो। मैं सीता का हरण अवश्य करूँगा। तुम नाना प्रकार के वेश धारण करने में अद्वितीय हो। मैं चाहता हूँ कि तुम रजत बिन्दुओं वाला स्वर्णमृग बन कर राम के आश्रम के सामने जाओ। तुम्हें देख कर सीता अवश्य राम-लक्ष्मण को तुम्हें पकड़ने के लिये भेजेगी। उन दोनों के चले जाने पर मैं अकेली सीता का अपहरण कर के ले जाउँगा। राम को सीता का वियोग असह्य होगा और विरह की उस अवस्था में राम को मार डालना मेरे लिये कठिन नहीं होगा।"

रावण के वचन सुनकर मारीच बोला, "हे लंकापति! जैसे कि मैं मैं पहले भी कह चुका हूँ कि ऐसा करना तुम्हारे लिये उचित नहीं होगा। यह कार्य तुम्हारे जीवन के लिये काल बन जायेगा। बड़े आश्चर्य की बात है कि वेद-शास्त्रों के ज्ञाता होते हुये भी तुम परस्त्री हरण जैसा भयंकर पाप करने जा रहे हो। तुम्हें स्मरण रखना चाहिये कि राम के क्रोध से तुम बच नहीं सकोगे।"

मारीच के इस उत्तर से क्रुद्ध हो हाथ में खड्ग ले कर रावण बोला, "मारीच! मैं तुझे अपना मित्र समझ कर तेरे पास आया था। तेरा अनर्गल प्रलाप सुनने के लिये नहीं। तेरी कायरतापूर्ण युक्तियों को सुन कर मैं अपना विचार नहीं बदल सकता। सीता का हरण मैं अवश्य ही करूँगा और तू मेरे आज्ञा का पालन भी करेगा। यदि तू मेरी आज्ञा मान कर मेरे इस कार्य में सहायता नहीं करेगा तो राम-लक्ष्मण से पहले मैं तेरा वध करूँगा।"

रावण के क्रोध से भयभीत होकर मारीच ने अपनी सहमति दे दी। उसकी सहमति से प्रसन्न हो कर रावण बोला, "अब तू सच्चा राक्षस है और मेरे परम मित्र है।" इसके पश्चात् रावण उसे ले कर दण्डक वन में पहुँच राम के आश्रम की खोज करने लगा। जब आश्रम मिल गया तो मारीच ने रावण के निर्देशानुसार मृग का रूप धारण किया और आश्रम के निकट विचरण करने लगा। इस अद्भुत स्वर्णिम मृग की शोभा देख कर सीता आश्चर्यचकित रह गई और विस्मित हो कर उसके पास पहुँची। मायावी मारीच ने अपनी मृग-सुलभ क्रीड़ाओं से सीता का मन मुग्ध कर लिया।

posted by जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com) @ 9:42 PM,

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