रावण को सूचना
Thursday, September 6, 2007
खर-दूषण का वध हो जाने पर खर के एक सैनिक अकम्पन, जिसने किसी प्रकार से भागकर अपने प्राण बचा लिये थे, ने रावण के दरबार में जाकर खर की सेना के नष्ट हो जाने की सूचना दी। रावण के समक्ष जाकर वह हाथ जोड़ कर बोला, "हे लंकेश! दण्डकारण्य में रहने वाले आपके भाई खर और दूषण का वध हो चुका है तथा उनके चौदह सहस्त्र सैनिक भी युद्ध में मारे गये। मैं बड़ी कठिनाई से बच कर आपको सूचना देने के लिये आया हूँ।" यह सुन कर रावण को बहुत दुःख हुआ साथ ही भारी क्रोध भी आया। उन्होंने कहा, "मेरे भाइयों का सेना सहित वध करने वाला कौन है? मैं अभी उसे नष्ट कर दूँगा। तुम मुझे पूरा वृतान्त बताओ।"
रावण का आदेश पाकर अकम्पन ने कहा, "हे लंकापति! अयोध्या के राजकुमार राम ने युद्ध में उन्हे मारा है। उसने अपने पराक्रम से अकेले ही सभी राक्षस वीरों को मृत्यु के घाट उतार दिया।" अकम्पन के वचन सुनकर रावण को आश्चर्य हुआ और उसने पूछा, "खर को मारने के लिये क्या देवताओं ने राम की सहायता की है?" अकम्पन ने उत्तर दिया, "नहीं प्रभो! देवताओं से राम को किसी प्रकार की सहायता नहीं मिली है, ऐसा उसने अकेले ही किया है। वास्तव में राम तेजस्वी, शक्तिवान और युद्ध विशारद योद्धा है। मैंने स्वयं अपनी आँखों से राम को राक्षस सेना का विनाश करते देखा है। खर जैसे रणबाँकुरे, जिसकी एक गर्जना से सारे देवता काँप जाते थे, को उनकी शक्तिशाली सेना सहित उसने आनन-फानन में समाप्त कर दिया। उसका रणकौशल देख कर मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि आप अपनी सम्पूर्ण सेना के साथ युद्ध करके भी उसे परास्त नहीं कर सकेंगे। मेरी दृष्टि में उस पर विजय पाने का एक ही उपाय है। उसके साथ उसकी पत्नी है जो अत्यन्त रूपवती, लावण्यमयी और सुकुमारी है। राम उससे बहुत प्रेम करता है इसीलिये वह उसे भी अपने साथ वन में लिये फिरता है। वह उसके बिना एक पल भी नहीं रह सकता। मेरा विश्वास है, यदि आप किसी प्रकार उसका अपहरण कर के ले आयें तो राम उसके वियोग में स्वयं ही मर जायेगा।। आपको युद्धभूमि में अकारण का रक्तपात भी नहीं करना पड़ेगा।"
लंकेश रावण को अकम्पन का यह प्रस्ताव सर्वथा उचित प्रतीत हुआ। यहाँ तक कि उसने इस विषय में अधिक सोच विचार करना या अपने मन्त्रियों से परामर्श करना भी उचित नहीं समझा। तत्काल ही वह अपने दिव्य रथ पर सवार हो आकाश मार्ग से उड़ता हुआ सागर पार कर के मारीच के पास पहुँचा। मारीच रावण का परम मित्र था। बिना किसी सूचना के अपने घनिष्ठ मित्र को अपने सम्मुख पाकर मारीच बोले, "हे मित्र! आज अचानक ही आपके यहाँ आने का क्या कारण है? आपकी इतनी हड़बड़ी देखकर मेरे मन में नाना प्रकार की शंकाएँ उठ रही हैं। लंका में सब कुशल तो है? आप शीघ्र ही अपने आने का कारण बता कर मेरी शंका को दूर कीजिये।
रावण ने कहा, "मैं एक विशेष कारण से ही यहाँ आया हूँ। अयोध्या के राजकुमार राम ने मेरे भाई खर और दूषण को उनकी सेना सहित मार कर अरण्य वन में स्थित मेरे जनस्थान को उजाड़ दिया है। इससे दुःखी हो कर मैं तुम्हारी सहायता लेने के लिये आया हूँ। मैं चाहता हूँ कि राम की पत्नी का अपहरण कर के मैं लंका ले जाऊँ और इसके लिये मुझे तुम्हारी सहायता की आवश्यकता है। सीता के वियोग में राम बिना युद्ध किये ही तड़प-तड़प कर मर जायेगा और मेरा प्रतिशोध पूरा हो जायेगा।"
रावण के वचनों को सुन कर मारीच बोला, "हे लंकापति! तुम्हारा यह विचार सर्वथा अनुचित है। जिसने भी तुम्हें सीता को हरने का सुझाव दिया है वह वास्तव में तुम्हारा मित्र नहीं शत्रु है। तुम राम से किसी प्रकार भी जीत नहीं सकोगे। राम के होते हुये तुम उससे सीता को नहीं छीन सकोगे। उसके अद्भुत पराक्रम के सम्मुख तुम एक क्षण भी नहीं टिक सकोगे। तुम्हारा हित इसी में है कि तुम इस विचार को भूलकर कर चुपचाप लंका में जा कर बैठ जाओ।" मारीच का उत्तर सुनकर निराश रावण लंका लौट आया।
posted by जी.के. अवधिया @ 9:16 PM,







