Site Network: हिंदी वेबसाइट | वाल्मीकि रामायण | हिंदी तथा अंग्रेजी व्याकरण | आइये कम्प्यूटर सीखें!

 

आदिकवि वाल्मीकि रचित संस्कृत महाकाव्य का संक्षिप्त हिंदी रूपान्तर



शूर्पणखा

रामचन्द्र के सीता और लक्ष्मण के साथ अपने आश्रम में वापस पहुँचने पर उन्होंने आश्रम के निकट एक राक्षस कन्या को देखा। वह राम के तेजस्वी मुखमण्डल, कमल-नयन तथा नीलाम्बुज सदृश शरीर की कान्ति को चकित होकर देख रही थी। उन्हें देख कर उसके हृदय में वासना का भाव जागृत हो उठा। राम के पास आकर वह बोली, "तुम कौन हो? इस वन में क्यों आये हो? इस प्रदेश में तो राक्षसों का राज्य है। तुम्हारा वेश तो तपस्वियों जैसा है, किन्तु हाथों में धनुष बाण भी है। साथ में स्त्री भी है। ये बातें परस्पर विरोधी हैं। अतः तुम अपना परिचय देकर और अपना पूरा वृतान्त सुनाकर मेरे आश्चर्य का निवारण करो।"

उसके प्रश्नों का उत्तर देते हुये राम ने सरल भाव से कहा, "हे राक्षसकन्ये! मैं अयोध्या के चक्रवर्ती नरेश महाराजा दशरथ का ज्येष्ठ पुत्र राम हूँ। मेरे साथ मेरा छोटा भाई लक्ष्मण और जनकपुरी के महाराज जनक की राजकुमारी तथा मेरी पत्नी सीता हैं। पिताजी की आज्ञा से हम चौदह वर्ष के लिये वनों में निवास करने के लिये आये हैं। यही हमारा परिचय है। अब तुम अपना परिचय देकर मेरी इस जिज्ञासा को शान्त करो कि तुम इस भयंकर वन में अकेली इस प्रकार क्यों घूम रही हो?" इस पर राक्षसी बोली, "मेरा नाम शूर्पणखा है। मैं लंका के नरेश परम प्रतापी महाराज रावण की बहन हूँ। समस्त संसार में विख्यात विशालकाय कुम्भकरण और परम नीतिवान विभीषण भी मेरे भाई हैं। वे सब लंका में निवास करते हैं। पंचवटी के स्वामी अत्यन्त पराक्रमी खर और दूषण भी मेरे भाई हैं। संसार में शायद ही कोई वीर ऐसा होगा जो इन दोनों भाइयों के साथ समरभूमि में युद्ध करके उन्हें पराजित कर सके। अपने इस परिचय के बाद अब मैं तुम्हें कुछ अपने विषय में और भी बताती हूँ। यह तो तुम देख ही रहे हो कि मैं रति से भी सुन्दर, पूर्ण यौवना और लावण्यमयी हूँ। तुम्हारे हृदयहारी रूप और कान्तिमय बलिष्ठ युवा शरीर को देख कर मैं तुम्हें अपना हृदय अर्पित कर बैठी हूँ। मेरी इच्छा है कि तुम पत्नी के रूप में मुझे स्वीकार कर के अपना शेष जीवन आनन्दपूर्वक व्यतीत करो। तुम्हारे लिये यह अत्यन्त सौभाग्य की बात होगी। मुझसे विवाह कर के तुम सहज ही त्रैलोक्य में विख्यात अद्भुत पराक्रमी लंकापति महाराज रावण के सम्बंधी बन जाओगे और फिर तुम्हारी ओर कोई आँख उठा कर भी नहीं देख सकेगा। मैं तुम्हें यह भी बता दूँ कि मुझे पाने के लिये सैकड़ों राजकुमार अपने प्राण न्यौछावर करने को तैयार हैं, किन्तु मैं स्वयं तुम्हारे सम्मुख अपना प्रणय-निवेदन रही हूँ।

उसके प्रस्ताव के उत्तर में राम बोले, "भद्रे! तुम देख रही हो कि मैं विवाहित हूँ और मेरी पत्नी मेरे साथ है। ऐसी स्थिति में मेरा तुसे विवाह करना न तो उचित है और न ही धर्मानुकूल। हाँ, मेरा भाई लक्ष्मण यहाँ अकेला है। यदि तुम चाहो तो उसे सहमत करके उससे विवाह कर सकती हो।"

राम का उत्तर सुन कर शूर्पणखा ने लक्ष्मण के पास जाकर तथा उन्हें वासनामयी दृष्टि से देखते हुये कहा, "हे राजकुमार! तुम सुन्दर हो और मैं युवा हूँ। हम दोनों की जोड़ी खूब फबेगी। मुझसे विवाह कर के तुम्हारा रावण के साथ सम्बंध स्थापित हो जायेगा जिससे तुम्हारी स्थिति राम से भी श्रेष्ठ हो जायेगी। फिर तुम्हारा वनवास का कटु जीवन सुख और ऐश्वर्य में बदल जायेगा। इसलिये तुम मुझे पत्नी के रूप में स्वीकार कर लो।" शूर्पणखा की कामातुर भाव-भंगिमा देख और विवाह का प्रस्ताव सुन कर वाक्-पटु लक्ष्मण ने कहा, "सुन्दरी! तुम राजकुमारी हो और मैं राम का एक तुच्छ सा दास हूँ। मुझसे विवाह करके तुम केवल दासी कहलाओगी। एक महान देश की राजकुमारी होकर दासी बनना तुम्हें कदापि शोभा नहीं देगा। अच्छा यही है कि तुम राम से ही विवाह कर के उनकी छोटी भार्या बन जाओ। तुम्हारा रूप-सौन्दर्य उन्हीं के योग्य है।" लक्ष्मण के प्रशंसा भरे युक्तिपूर्ण वचन शूर्पणखा को अच्छे लगे और वह पुनः राम के पास जा कर क्रोध से बोली, "हे राम! इस कुरूपा सीता के लिये तुम मेरा विवाह प्रस्ताव अस्वीकार कर के मेरा अपमान कर रहे हो। इसलिये पहले मैं इसे ही मार कर समाप्त किये देती हूँ। फिर तुम्हारे साथ विवाह कर के मैं अपना जीवन आनन्दपूर्वक व्यतीत करूँगी।" इतना कह कर प्रचंड क्रोध करती हुई शूर्पणखा विद्युत वेग से सीता पर झपटी। राम ने उसके इस आकस्मिक आक्रमण को बड़ी कठिनाई से किन्तु तत्परता के साथ रोका। शूर्पणखा को सीता से अलग करके वे लक्ष्मण से बोले, "हे वीर! इस दुष्टा राक्षसी से अधिक वाद-विवाद करना या इसके साथ हास्य विनोद करना उचित नहीं है। इसने तो जानकी की हत्या ही कर डाली होती। तुम इसके नाक कान काट कर इस दुश्चरित्र को ऐसी शिक्षा दो कि भविष्य में फिर कभी ऐसा आचरण न कर सके।"

राम की आज्ञा पाते ही लक्ष्मण ने तत्काल खड्ग निकाला और दुष्टा शूर्पणखा के नाक-कान काट डाले। पीड़ा और घोर अपमान के कारण रोती हुई शूर्पणखा अपने भाइयों, खर-दूषण, के पास पहुँची और घोर चीत्कार कर के उनके सामने गिर पड़ी।

posted by जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com) @ 8:19 PM,

0 Comments:

Post a Comment

Links to this post:

Create a Link

<< Home