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आदिकवि वाल्मीकि रचित संस्कृत महाकाव्य का संक्षिप्त हिंदी रूपान्तर



सीता की शंका

कुछ दूर जाने के बाद सीता ने रामचन्द्र से कहा, "स्वामिन्! मेरे मन में एक शंका उठ रही है। यद्यपि आप शास्त्रों के ज्ञाता तथा धर्म पर सुदृढ़ रहने वाले हैं फिर भी एक ऐसे कार्य में प्रवृत होने जा रहे हैं जो आपके योग्य नहीं है। हे नाथ! मनुष्य के इच्छाजनित तीन दोष ऐसे हैं जिनका उन्हें परित्याग करना चाहिये। वे दोष हैं मिथ्या भाषण जो आपने न तो कभी किया है और न ही कभी करेंगे। दूसरा दोष है पर-स्त्रीगमन जो धर्म का नाश करके लोक परलोक दोनों को ही बिगाड़ता है। एकपत्नीव्रतधारी और महान सदाचारी होने के कारण यह कार्य भी आपके लिये असम्भव है तीसरा दोष है रौद्रता। और मुझे प्रतीत होता है कि इस दोष को आप करने जा रहे हैं। आपने इन तपस्वियों के सामने राक्षसों को समूल नष्ट कर डालने की जो प्रतिज्ञा की है, उसी में मुझे दोष दृष्टिगत हो रहा है। मेरे विचार से आपका लक्ष्मण के साथ धनुष चढ़ाकर इस वन में प्रवेश करना कल्याणकारी नहीं है। यह मुझे अच्छा नहीं लगता कि जिन राक्षसों ने आपको कोई क्षति नहीं पहुँचाई है उनकी हत्या करके आप व्यर्थ ही अपने हाथों को रक्त-रंजित करें। मेरे विचार से यह अनुचित और दोषपूर्ण कृत्य है।

"मुझे एक वृतान्त, जिसे मैंने बचपन में सुना था, स्मरण आ रहा है। किसी वन में, केवल फलाहार करके ईश्वर की आराधना में तल्लीन रहने वाले, एक ऋषि रहते थे। उनकी कठोर तपस्या से भयभीत होकर इन्द्र ने उनकी तपस्या को भंग करना चाहा। उनकी तपस्या भंग करने के लिये एक दिन इन्द्र ऋषि के आश्रम में पहुँचे और विनीत स्वर में बोले, "हे महर्षि! मेरा यह खड्ग आप अपने पास धरोहर के रूप में रख लीजिये, जब मुझे इसकी आवश्यकता होगी, मैं आपके पास से वापस ले जाउँगा।" इन्द्र के इस प्रकार विनती करने पर ऋषि ने उस खड्ग को लेकर अपनी कमर में बाँध लिया जिससे वह खो न जाय। कमर में खड्ग बाँधने के प्रभाव से उनमें तामस भाव उत्पन्न हुआ और उनके प्रवृति में रौद्रता आने लगी। परिणामस्वरूप वे तपस्या कम और निरीह पशुओं का शिकार अधिक करने लगे। इस पापकर्म के फलस्वरूप अन्त में उन्हें नर्क की यातना सहनी पड़ी। हे स्वामी। शस्त्र और अग्नि की संगति एक सा प्रभाव दिखाने वाली होती है। आपकी यह भीषण प्रतिज्ञा और आप दोनों भाइयों का निरन्तर धनुष उठाये फिरना, दोनों ही, आप लोगों के लिये कल्याणकारी नहीं है। आपको उन निर्दोष राक्षसों की हत्या नहीं करनी चाहिये जिनका आपके प्रति कोई बैर-भाव नहीं है। फिर बिना शत्रुता के किसी की हत्या करना लोक में निन्दा का कारण भी बनती है। हे नाथ! आप ही सोचिये, कहाँ वन का शान्त तपस्वी अहिंसामय जीवन और कहाँ शस्त्र-संचालन। कहाँ तपस्या और कहाँ निरीह प्राणियों की हत्या। ये परस्पर विरोधी बातें हैं। आपने वन में आकर तपस्वी का जीवन अपनाया है इसलिये उसी का पालन कीजिये। वैसे भी सनातन नियम यह है कि बुद्धमान लोग कष्ट सहकर भी अपने धर्म की साधना करते हैं। यह तो आप जानते हैं कि संसार में कभी सुख से सुख नहीं मिलता, दुःख उठाने पर ही सुख की प्राप्ति होती है।"

सीता के वचनों को सुनकर राम बोले, "सीते! यद्यपि जो कुछ तुमने कहा, उसमें अनुचित कुछ भी नहीं है और फिर मेरे कल्याण की दृष्टि से ही तुमने यह बात कही है। किन्तु हम लोगों का धनुष बाण धारण करने का एकमात्र प्रयोजन आर्यों की रक्षा करना है। यह तो तुम देख ही चुकी हो कि यहाँ निवास करने वाले ऋषि-मुनि और तपस्वी राक्षसों के कारण अत्यन्त दुःखी हैं। इसीलिये वे उनसे अपनी रक्षा चाहते हैं तथा इसके लिये उन्होंने मुझसे प्रार्थना भी की है। उनकी रक्षा के लिये ही मैंने प्रतिज्ञा भी की है। क्षत्रिय का धर्म असहाय और दुखियों की रक्षा करना है। क्या तुम्हारे विचार से यह उचित है कि मैं उस प्रतिज्ञा को भंग कर दूँ? तुम यह कदापि नहीं चाहोगी कि मैं प्रतिज्ञा भंग करके झूठा कहलाऊँ जबकि सत्य मुझे प्राणों से भी प्रिय है। ऋषि-मुनि और ब्राह्मणों की सेवा तो मुझे बिना कहे ही करनी चाहिये। फिर मैं तो उन्हें वचन भी दे चुका हूँ। फिर भी जो कुछ तुमने कहा उससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ।"

इसके पश्चात् उन लोगों ने अगस्त्य मुनि के दर्शन के लिये प्रस्थान किया। किन्तु उन्हें उनके आश्रम का पता नहीं चल पाया। काल चक्र चलता रहा और अनेक ऋषि-मुनियों के दर्शन करते तथा वनों में भ्रमण करते हुये दस वर्ष व्यतीत हो गये। इस अवधि में उन्होंने अलग-अलग स्थानों में एक-एक दो-दो वर्ष तक कुटिया बनाकर निवास किया। साथ ही साथ अगस्त्य मुनि के आश्रम की भी खोज करते रहे परन्तु अनेक प्रयत्न करने पर भी उनका आश्रम न पा सके। अन्त में वे लौटकर पुनः सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में आये और बोले, "हे महर्षि! मैं पिछले दस वर्ष से वन में भटककर महर्षि अगस्त्य के आश्रम की खोज कर रहा हूँ किन्तु अभी तक उनके दर्शनों का लाभ प्राप्त नहीं कर सका हूँ। उनके दर्शनों की मुझे तीव्र लालसा है। इसलिये कृपा करके आप उनके आश्रम में पहुँचने के लिये मार्ग बताइये।

इस पर मुनिराज सुतीक्ष्ण ने कहा, "हे राम! तुम यहाँ से दक्षिण दिशा की ओर सोलह कोस जाओ। वहाँ तुम्हें एक विशाल पिप्पली वन दिखाई देगा जहाँ के वृक्ष प्रत्येक ऋतु में खिलने वाले सुगन्धियुक्त रंग-बिरंगे फूलों से लदे वृक्ष मिलेंगे। उन पर नाना प्रकार की बोलियों में कलरव करते हुये असंख्य पक्षी होंगे। अनेक प्रकार के हंसों, बकों, कारण्डवों आदि से युक्त सरोवर भी दिखाई देंगे। उसी वन में महात्मा अगस्त्य के भाई का आश्रम है जो वहाँ ईश्वर साधना में तल्लीन रहते हैं। कुछ दिन उनके आश्रम में रहकर विश्राम करें। जब तुम्हारी मार्ग की क्लान्ति मिट जाय तो वहाँ से दक्षिण दिशा की ओर वन के किनारे चलना। वहाँ से चार कोस की दूरी पर महर्षि अगस्तय का शान्त मनोरम आश्रम है जिसके दर्शन मात्र से अद्वितीय शान्ति मिलती है।

posted by जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com) @ 10:00 PM,

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