महर्षि शरभंग
Monday, August 20, 2007
विराध राक्षस का वध करने के पश्चात् सीता और लक्ष्मण के साथ राम महामुनि शरभंग के आश्रम में पहुँचे। महर्षि शरभंग अत्यन्त वृद्ध और शरीर से जर्जर थे तथा प्रतीत होता था कि उनका अन्त-काल निकट है। उन्होंने महर्षि के चरणस्पर्श करके उन्हें अपना परिचय दिया। महर्षि शरभंग ने आगतों का सत्कार किया और कहा, "हे राम! इस वन-प्रान्त में तुम जैसे अतिथियों कभी-कभी ही आते हैं। मैं अपने शरीर को त्यागने के पहले तुम्हारा दर्शन करना चाहता था इसलिये तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा था। अब तुम्हारे दर्शन हो गये, इसलिये मैं इस नश्वर जर्जर शरीर का परित्याग कर ब्रह्मलोक में जाउँगा। मैं चाहता हूँ कि मेरा अग्नि संस्कार तुम्हारे ही हाथों से हो।" इतना कहने के बाद महर्षि ने स्वयं अपने शरीर को प्रज्जवलित अग्नि को समर्पित कर दिया।
इस घटना के पश्चात् आश्रम की निकटवर्ती कुटियाओं में निवास करने वाले ऋषि-मुनियों ने रामचन्द्र से प्रार्थना की, "हे राघव! क्षत्रिय नरेश होने के कारण हम लोगों की रक्षा करना आपका कर्तव्य है। हमारी रक्षा करने के बदले में रक्षा करने वाले को भी हमारी तपस्या के चौथाई भाग का फल प्राप्त होता है। परन्तु शोक की बात यह है कि आप जैसे धर्मात्मा राजाओं के होते हुये भी राक्षस लोग अनाथों की तरह हमें सताते हैं और हमारी हत्या करते हैं। इन राक्षसों ने पम्पा नदी, मन्दाकिनी और चित्रकूट में भयानक उपद्रव मचा रखा है। उन्होंने तपस्वियों के लिये तपस्या करना ही नहीं जीना भी दूभर कर रखा है। ये समाधिस्थ तपस्वियों को असावधान पाकर मृत्यु के मुख में पहुँचा देते हैं। इसलिये हम आपकी शरण आये हैं। इस असह्य कष्ट और अपमान से हमारी रक्षा करके आप हमें निर्भय होकर तप करने का अवसर दें।
राम बोले, "हे मुनियों! मुझे आपके कष्टों के विषय में सुनकर बहुत दुःख हुआ है। आप मुझे बताइये, मुझे क्या करना चाहिये। पिता की आज्ञा से अभी मुझे चौदह वर्ष पर्यन्त इन वनों में निवास करना है। इस अवधि में राक्षसों को चुन-चुन कर मैं उनका नाश करना चाहता हूँ। मैं आप सबके समक्ष प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं अपने भुजबल से पृथ्वी के समस्त ऋषि-द्रोही राक्षसों को समाप्त कर दूँगा। आप लोग मुझे आशीर्वाद दें जिससे मैं इस उद्देश्य में सफल हो सकूँ।
उन्हें धैर्य बँधाने और राक्षसों के विनाश की प्रतिज्ञा करने के बाद रामचन्द्र सीता और लक्ष्मण के साथ मुनि सुतीक्ष्ण के आश्रम में आये। वहाँ उन्हों ने अतिवृद्ध महात्मा सुतीक्ष्ण के चरण स्पर्श किये और उन्हें अपना परिचय दिया। राम का परिचय पाकर महर्षि अत्यन्त प्रसन्न हुये और तीनों को समुचित आसन दे कुशलक्षेम पूछा तथा फल आदि से उनका सत्कार किया। वार्तालाप करते करते सूर्यास्त की बेला आ पहुँचने पर उन सबने एक साथ बैठकर सन्ध्या उपासना की। रात्रि विश्राम भी उनके आश्रम में ही हुआ। प्रातःकाल राम बोले, "हे महर्षि! हम दण्डक वन में निवास करने वाले ऋषि-मुनियों के दर्शन करना चाहते हैं। सुना है कि यहाँ ऐसे अनेक ऋषि-मुनि हैं जो सहस्त्रों वर्षों से केवल फलाहार करके दीर्घकालीन तपस्या करते हुये सिद्धि को प्राप्त कर चुके हैं। ऐसे महात्माओं के दर्शनों से जन्म-जन्मान्तर के पाप नष्ट हो जाते हैं। इसलिये आप हमें वहाँ जाने की आज्ञा दीजिये।"
राम की विनीत वाणी सुनकर महात्मा ने आशीर्वाद देकर प्रेमपूर्वक उन्हें विदा किया और कहा, "हे राम! तुम्हारा मार्ग मंगलमय हो। वास्तव में यहाँ के तपस्वी अथाह ज्ञान और भक्ति के भण्डार हैं। उनके अवश्य दर्शन करो। इस वन का वातावरण भी तुम्हारे सर्वथा अनुकूल है। इसमें तुम लोग भ्रमण करके अपने वनवास के समय को सार्थक करो। इससे सीता और लक्ष्मण का भी मनोरंजन होगा।"
posted by जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com) @ 9:58 PM,








