महर्षि अत्रिका आश्रम
Saturday, August 18, 2007
भरत के चित्रकूट से प्रस्थान करने के पश्चात् रामचन्द्र लक्ष्मण से बोले, "भैया! माताओं के चले जाने से मेरा हृदय उदास तथा उद्विग्न हो गया है। इस स्थान के साथ उन सबकी स्मृति जुड़ जाने के कारण मुझे बारम्बार उनकी स्मृति सताने लगी है। इसलिये मेरा विचार है कि अब हम इस स्थान का परित्याग करके अन्यत्र जाकर निवास करें।" इस प्रकार सीता और लक्ष्मण से अपने विचार का अनुमोदन लेकर उन्होंने चित्रकूट का परित्याग किया और चलत-चलते महर्षि अत्रि के आश्रम में जा पहुँचे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने परमतपस्वी वृद्ध महर्षि को प्रणाम कर अपना परिचय दिया। महर्षि अत्रि ने उनका अपने पुत्रों की भाँति स्नेहपूर्वक स्वागत किया। फिर महर्षि अत्रि ने अपनी वृद्धा पत्नी अनुसूया को बताया कि मिथिलानरेश की राजकुमारी तथा अयोध्या की ज्येष्ठ पुत्रवधू सीता तुम्हारे सम्मुख उपस्थित है। इनका यथोचित सत्कार करो।" राम ने भी सीता से कहा, "सीते! माता के समान स्नेहमयी अनुसूया देवी के चरण स्पर्श करो।"
सीता ने अनुसूया के चरण स्पर्श किये और उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया। अनुसूया बोलीं, "सीता! मैं तुम्हारे त्याग भाव से अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुमने राजप्रासाद के सुख ऐश्वर्य का परित्याग कर अपने पति के साथ वन में, जहाँ पर नाना प्रकार के कष्टों को झेलना पड़ता है, रहने का का जो निश्चय किया है। इस प्रकार तुमने तीनों लोकों में नारी के पतिव्रत धर्म की महिमा को उजागर कर दिया है। हे सुभगे! स्वर्ग स्वयं उस स्त्री के चरणों पर न्यौछावर हो जाता है जो अपने पति के गुण-अवगुणों का विचार किये बिना उसे ईश्वर के समान सम्मान देती है और प्रत्येक दुःख-सुख में उसका अनुसरण करती है। पति चाहे कितना ही कुरूप, दुश्चरित्र, क्रोधी और निर्धन क्यों न हो, वह पत्नी के लिये सदैव श्रद्धेय है। उसके जैसा कोई दूसरा सम्बंधी अपना नहीं होता। पति की सच्ची सेवा ही स्वर्ग का मार्ग प्रशस्त करती है। जो स्त्री अपने पति में दुर्गुण देखती है, उस पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिये उसके साथ नित्य कलह करती है तथा उसकी अवमानना और उसकी आज्ञाओ की अवहेलना करती है, उसे इस लोक में अपयश तो मिलता ही है पर मृत्यु के पश्चात् नर्क को भी जाती है। तुम्हें तो किसी प्रकार की शिक्षा देने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि तुम तो स्वयं सब शास्त्रों को जानने वाली हो तथा अपने पति की अनुगामिनी हो। तुमने अपने कर्तव्य पालन करके तीनों लोकों में कीर्ति प्राप्त की है। मेरा आशीर्वाद है कि तुम्हारी बुद्धि सदा इसी प्रकार निर्मल बनी रहे।"
देवी अनुसूया के इन उपदेशों को सुनकर सीता बोली, "हे आर्या! आपके उपदेश निःसंदेह महत्वपूर्ण है। मेरी माता और सास ने भी मुझे यही शिक्षा दी है कि पति स्त्री का गुरु, देवता और सर्वस्व होता है। अब आपके द्वारा दी गई शिक्षा को भी मैंने हृदयंगम कर ली हैं। मैं आपको विश्वास दिलाती हूँ कि पति का अनुगमन ही मेरे जीवन का एकमात्र लक्ष्य है और मैं कभी इस मार्ग से विचलित नहीं होउँगी।"
सीता के वचनों को सुनकर अनुसूया ने कहा, "पुत्री! मैं तुझसे बहुत प्रसन्न हूँ। अपनी इच्छानुसार कोई वर माँग ले। यद्यपि मैं वनवासिनी हूँ फिर भी दैवी शक्ति से किसी भी मानव की मनोकामना पूर्ण करने में समर्थ हूँ।" सीता बोलीं, "माता! मैं पूर्णतया सन्तुष्ट हूँ। आपकी मुझ पर अतीव कृपा है, यही मेरे लिये यथेष्ठ है।" इस पर प्रसन्न होकर अनुसूया ने कहा, "हे जानकी! तुम सदा सौभाग्वती रहो। तुमने कुछ भी नहीं माँगा है तथापि मैं तुम्हें यह दिव्य माला देती हूँ, जिसके फूल कभी नहीं कुम्हलायेंगे, ये दिव्य वस्त्र न कभी मैले होंगे और न फटेंगे तथा यह सुगन्धित अंगराग कभी फीका नहीं पड़ेगा।" यह कहकर उन्होंने तीनों वस्तुएँ सीता को दकर उन्हें अपने सम्मुख ही धारण कराया। उनके चरणों में सिर नवाकर सीता रामचन्द्र के पास गईं और उन्हें वे सब उपहार दिखाये। सन्ध्या को सबने साथ बैठकर सन्ध्योपासना की। फिर अनुसूया सीता को चंद्र की शुभ्र ज्योत्नायुक्त रात्रि में वन की शोभा दिखाने के लिये ले गईं। इसके पश्चात् आध्यात्मिक चर्चायें हुईं। फिर सबने मुनि के आश्रम में विश्राम किया।
प्रातःकाल राम आश्रम से विदा होते समय अत्रि ऋषि बोले, "हे रघुनन्दन! इन वनों में मनुष्यों को नाना प्रकार के कष्ट देने वाले भयंकर राक्षस तथा सर्प निवास करते हैं जिनके कारण अनेक तपस्वियों को असमय ही काल कालवित हो जाना पड़ा है। मैं इच्छा है कि तुम इनका विनाश करके तपस्वियों की रक्षा करो।" राम ने महर्षि की आज्ञा को शिरोधार्य किया तथा उपद्रवी राक्षसों तथा मनुष्य का प्राणान्त करने वाले भयानक सर्पों को नष्ट करने का वचन दिया। फिर सीता तथा लक्ष्मण के साथ आगे के लिये प्रस्थान कर गये।
॥वाल्मीकि रामायण अयोध्याकाण्ड समाप्त॥
posted by जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com) @ 7:38 PM,
1 Comments:
- At August 19, 2007 12:26 AM, Gyandutt Pandey said...
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अत्रि के पुत्र थे चन्द्र. उनके नाम पर गोत्र है - चान्द्रात्र. मैं चन्द्र का आश्रम ढ़ूंढ़ रहा था सो आपकी पोस्ट पर आया.
कुछ मालूम होगा आपको चन्द्र के आश्रम के विषय में? अत्रि के दूसरे पुत्र दत्तात्रेय के विषय में तो बहुत सुना है.









