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आदिकवि वाल्मीकि रचित संस्कृत महाकाव्य का संक्षिप्त हिंदी रूपान्तर



भरत का अयोध्या लौटना

राम ने भरत को हृदय से लगा लिया और कहा, "भैया भरत! तुम तो अत्यंत नीतिवान हो। क्या तुम्हारे विचार से मेरे लिये राज्य के निमित्त पिता के वचनों को भंग करना उचित है? क्या धर्म से पतित होना उचित है? तुम किसी भी प्रकार से दोषी नहीं हो। तुम्हें दुःखी और लज्जित होने की किंचित मात्र भी आवश्यकता नहीं है। और माता कैकेयी की निन्दा करना भी उचित नहीं है क्योंकि उन्होंने पिताजी की अनुमति से ही वर माँगे थे। मेरे लिये माता कैकेयी उतनी ही सम्माननीय हैं जितनी कि माता कौशल्या। तुम जानते हो कि मैं पिताजी की आज्ञा का उल्लंघन कदापि नहीं कर सकता। उन्होंने स्वयं ही तुम्हें राज्य राज्य प्रदान किया है, अतः उसे ग्रहण करना तुम्हारा कर्तव्य है। पिताजी के स्वर्ग चले जाने का मुझे अत्यंत दुःख है। मुझ अभागे को उन्होंने अपनी सेवा, अन्तिम दर्शन और दाह संस्कार का अवसर भी नहीं दिया।" इतना कहते-कहते राम के नेत्रों से अश्रुधारा बह चली। फिर उन्होंने सीता से जाकर कहा, "प्रिये! पूज्य पिताजी स्वर्गलोक सिधार गये।" और लक्ष्मण को संबोधित करते हुये बोले, "भैया! हम पितृविहीन हो गये। अभी-अभी मुझे यह समाचार भरत से प्राप्त हुआ है।" इस सूचना को सुनते ही सीता और लक्ष्मण बिलख-बिलख कर रो पड़े। इसके पश्चात् राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ मन्दाकिनी के तट पर जाकर पिता को जलांजलि दी। वक्कल चीर धारणकर हंगुदी के गूदे का पिण्ड बनाया। फिर उस पिण्ड को कुशा पर रख कर उनका तर्पण किया। पिण्डोदक देने तथा स्नानादि से निवृत होने के पश्चात् वे अपनी कुटिया में लौटे और भाइयों को भुजाओं में भर कर रोने लगे।

उनका आर्तनाद सुनकर गुरु वशिष्ठ तथा सभी रानियाँ वहाँ आ पहुँचीं। उनके विलाप करने में वे रानियाँ भी सम्मिलित हो गईं। फिर प्रयास करके तथा हृदय में धैर्य धारण करके राम, लक्ष्मण और सीता ने सब रानियों एवं गुरु वशिष्ठ के चरणों की वन्दना की। कुछ काल पश्चात् समस्त आगत रामचन्द्र को घेर कर बैठ गये और महाराज दशरथ के विषय में शोक चर्चा करने लगे। इस प्रकार वह रात्रि व्यतीत हो गई। प्रातःकाल संध्योपासनादि से निवृत होकर भरत राजगुरु तथा मन्त्रीगण राम के पास आये और बोले, "हे रघुकुलशिरोमणि! प्रतिज्ञा से बँधे होने के कारण पिताजी ने अयोध्या का राज्य मुझे मुझे प्रदान किया था। अब मैं उसे आपको समर्पित करता हूँ। आप इसे कृपा करके स्वीकार करें। इस पर राम ने कहा, "भरत! मुझे विदित है कि पिता की मृत्यु और मेरे वनवास से तुम अत्यंत दुःखी हो। किन्तु भाग्य के विधान को भला कौन टाल सकता है। और इसके लिये किसी को दोष देने की भी आवश्यकता नहीं है। संयोग के साथ वियोग का और जन्म के साथ मृत्यु का सम्बंध तो सदा से चला आया है। हमारे पिता सहस्त्रों यज्ञ, दान तप आदि करने के पश्चात् स्वर्ग सिधारे हैं। इसलिये उनके लिये शोक करना व्यर्थ है। तुम्हें पिताजी की आज्ञा मानकर अयोध्या का राज्य करना चाहिये और मुझे भी उनकी आज्ञा का पालन करते हुये वन में निवास करना चाहिये। ऐसा न करने से मुझे और तुम्हें दोनों को ही नरक की यातना भोगनी पड़ेगी।" राम के मुख से निकले ये तर्कपूर्ण वचन अकाट्य थे। इन वचनों को सुनकर भरत हाथ जोड़कर बोले, "हे आर्य! इस दुर्घटना घटने के समय मैं अपने नाना के घर में था। यह सारा अनिष्ट मेरी माता की मूर्खता के कारण हुआ। धर्माधर्म का कुछ ज्ञान मैं भी रखता हूँ अतः मैं आपके अधिकार का अपहरण कदापि नहीं कर सकता। फिर क्षत्रिय का धर्म जटा धारण करके तपस्वी बनना नहीं अपितु प्रजा का पालन करना है। आपसे आयु, ज्ञान, विद्या आदि सबमें छोटा होते हुये भी मैं सिंहासन पर कैसे बैठ सकता हूँ? इसीलिये आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप राजसिंहासन पर बैठकर मेरे माता को लोक निन्दा से और पिताजी को पाप से बचाइये अन्यथा मुझे भी वन में रहने की अनुमति दीजिये।"

भरत को पुनः समझाते हुये रामचन्द्र ने कहा, "पिताजी ने तुम्हें राज्य और मुझे चौदह वर्ष के लिये वनवास की आज्ञा दी है। जिस प्रकार मैं उनके वचनों पर श्रद्धा रखकर उनकी आज्ञा का पालन कर रहा हूँ, उसी प्रकार तुम भी उनकी आज्ञा को अकाट्य मानकर अयोध्या पर शासन करो। यदि हम उनके वचनों को अवहेलना करेंगे तो उनकी आत्मा को क्लेश पहुँचेगा। तुम्हें राजकार्य में समुचित सहायता देने के लिये बुद्धिमान शत्रुघ्न तुम्हारे साथ हैं ही। पिताजी को अपनी प्रतिज्ञा के ऋण से मुक्ति दिलाना हम चारों भाइयों का धर्म है।"

इस पर अयोध्या के अत्यन्त चतुर मन्त्री जाबालि ने कहा, "रामचन्द्र! सत्य तो यह है कि इस संसार में कोई किसी का सम्बंधी नहीं होता। सारे नाते मिथ्या हैं। नातों के मायाजाल में फँसकर स्वयं को नष्ट करना बुद्धिमानी नहीं है। इसलिये पितृऋण के मिथ्या विचार को त्याग दें और राज्य को स्वीकार करें। स्वर्ग-नर्क, परलोक, कर्मों का फल आदि सब काल्पनिक हैं। जो प्रत्यक्ष है, वही सत्य है। अतः परलोक की मिथ्या कल्पना से स्वयं को कष्ट पहुँचाना आपके लिये उचित नहीं है।"

जाबालि के इस मन्त्रणा के उत्तर में राम बोले, "मन्त्रिवर! आपके ये नास्तिक विचार मेरे हित के के लिये उचित न होकर वास्तव में अहितकारी है। मेरे विचारों में सदाचार और सच्चरित्रता का अधिक महत्व है। यदि राजा सत्य के मार्ग से विचलित हो जायेगा तो प्रजा भी उसका अनुसरण कर कुपथगामी हो जायेगी। अतएव मैं आपके इस अनुचित परामर्श को स्वीकार करने में असमर्थ हूँ। मुझे तो आश्चर्य के साथ ही साथ दुःख इस बात का है कि पिताजी जैसे परम आस्तिक तथा धर्मपरायण नरेश ने आप जैसे नास्तिक व्यक्ति को मन्त्रीपद कैसे दे दिया।" राम के कठोर वचनों को सुनकर जाबालि ने कहा, "राघव! मैं नास्तिक नहीं हूँ। भरत के बार-बार आग्रह करने तथा आपके द्वारा अस्वीकार करने के कारण ही, आपको लौटा ले जाने के लिये, मैंने अनुचित तर्क का सहारा लिया। इसके अतिरिक्त मेरी मन्द बुद्धि में और कोई उपाय नहीं सूझा।"

राम ने किसी प्रकार भी भरत की प्रार्थना को स्वीकार नहीं किया। अंततः भरत ने हाथ जोड़कर कहा, "हे तात! मेरी अटल प्रतिज्ञा है कि मैं आपके राज्य को ग्रहण नहीं करूँगा। यदि आप पिताजी की आज्ञा का पालन ही करना चाहते हैं तो अपने स्थान पर मुझे वन में रहने की अनुमति दीजिये। इस प्रकार भी पिता को माता के ऋण से मुक्ति मिल जायेगी।" इन स्नेहपूर्ण वचनों को सुनकर राम मन्त्रियों और पुरवासियों की ओर देखकर बोले, "जो कुछ भी हो चुका है उसे न तो मैं उलट सकता हूँ और न भरत। वनवास की आज्ञा तो मुझे हुई है, न कि भरत को। माता कैकेयी का कथन और पिताजी का कर्म दोनों ही उचित हैं। भरत मातृभक्त, पितृभक्त और गुरुभक्त हैं, सर्वगुण सम्पन्न हैं। अतः पिताजी को ऋण मुक्त करने के लिये उनका ही राज्य करना उचित है।"

भरत ने राम के अयोध्या लौटने का कोई उपाय न देखकर रोते हुये कहा, "भैया! यह मैं जानता हूँ कि आपकी प्रतिज्ञा अटल है, परन्तु यह भी अटल सत्य है कि अयोध्या का राज्य आप ही का है। इसलिये आप अपनी चरण पादुकाएँ मुझे प्रदान करें। मैं इन्हें अयोध्या के राजसिंहासन पर रखूँगा और स्वयं नगर के बाहर रहकर आपके सेवक के रूप में राजकाज चलाउँगा। वक्कल धारण करके ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करूँगा। चौदहवें वर्ष के अन्तिम दिन यदि आप अयोध्या न पहुँचे तो मैं अग्नि में स्वयं को भस्म कर दूँगा, यह मेरी अटल प्रतिज्ञा है।" इस पर रामचन्द्र जी ने भरत को कण्ठ से लगाकर उन्हें अपनी पादुका दे दी और शत्रुघ्न को समझाते हुये कहा, "भैया! माता कैकेयी को कभी अपशब्द कहकर उनका अपमान मत करना। वे हम सबकी पूज्य माता हैं। इस बात को कभी न भूलना, तुम्हें मेरी और सीता की शपथ है।" फिर माताओं को धैर्य बँधा कर सम्मानपूर्वक सबको विदा किया।

श्री राम की चरण पादुकाएँ ले भरत शत्रुघ्न सहित रथ पर सवार हुये। उनके पीछे चलने वाले रथों पर माताएँ, गुरु एवं पुरोहित, मन्त्रीगण तथा अन्य पुरवासी चले। उनके पीछे सेना चली। उदास मन से सब लोग मार्ग की दूरी पारकर तीन दिन में अयोध्या पहुँचे। मार्ग की क्लान्ति को मिटाकर भरत गुरु वशिष्ठ के पासे जाकर बोले, "गुरुदेव! यह तो आप जानते ही हैं कि अयोध्या के वास्तविक नरेश राम हैं। उनकी अनुपस्थिति में उनकी चरण पादुकाएँ सिंहासन की शोभा बढ़ायेंगी। मैं नगर से दूर नन्दि ग्राम में पर्णकुटी बनाकर निवास करूँगा और वहीं से राजकाज का संचालन करूँगा।" फिर समस्त मन्त्रियों को उनका कार्य सौंपकर वे नन्दि ग्राम से राज्य का कार्य राम के प्रतिनिधि के रूप में देखने लगे।

posted by जी.के. अवधिया @ 2:29 AM,

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