दशरथ की अन्त्येष्टि
Monday, August 13, 2007
दूसरे दिन प्रातःकाल गुरु वशिष्ठ शोकाकुल भरत के पास आये। उन्होंने भरत को धैर्य बंधाते हुये महाराज दशरथ की अन्त्येष्टि करने के लिये प्रेरित किया। राजगुरु की आज्ञा का पालन करने के लिये प्रयास करके भरत ने हृदय में साहस जुटाया और अपने स्वर्गीय पिता का प्रेतकर्म प्रारम्भ किया। तेल कुण्ड में डूबे हुये शव को निकाल कर अर्थी पर लिटाया गया। अर्थी पर पिता का शव देखकर भरत का हृदय चीत्कार कर उठा। रो-रो कर वे कहने लगे, "हा पिताजी! आप मुझे छोड़ कर चले गये। तनिक भी विचार नहीं किया कि अनाथ होकर मैं किसके आश्रय में जियूँगा। आप भी मुझे दोषी समझते हैं इसीलिये मुझसे बात नहीं कर रहे हैं। आप स्वर्ग चले गये, भैया राम वन को चले गये, अब इस अयोध्या का राज्य कौन सँभालेगा?"
विलाप करते हुये भरत से महर्षि वशिष्ठ ने कहा, "वत्स! अब शोक त्यागकर महाराज का प्रेतकर्म आरम्भ करो।" उनके कहने पर भरत ने अर्थी को रत्नों से सुसज्जित कर ऋत्विज पुरोहितों तथा आचार्यों के निर्देशानुसार अग्निहोत्र किया। भरत, शत्रुघ्न और वरिष्ठ मन्त्रीगण अर्थी को कंधे पर उठाकर श्मशान की ओर चले। रोती-बिलखती प्रजा भी शवयात्रा में पीछे-पीछे चलने लगी। अर्थी के आगे निर्धनों के लिये सोना, चाँदी, रत्न आदि लुटाये जा रहे थे। सरयू तट पर चन्दन, गुग्गुल आदि से चिता बनाया गया और शव को उस पर लिटाया गया। सभी रानियाँ विलाप करके रोने लगीं। भरत ने चिता में अग्नि प्रज्वलित किया और सत्यपरायण महात्मा दशरथ का नश्वर शरीर पंचभूत में समा गया।
तेरहवें दिन जब भरत अपने पिता के अंतिम संस्कार से निवृत हुये तो मन्त्रियों ने उनसे निवेदन करते हुये कहा, "हे रघुकुल भूषण! दिवंगत महाराज अपने जीते जी आपको राजा बना गये हैं इसलिये अब आप न्यायपूर्वक हमारे राजा हैं। अतः अब आप सिंहासन पर आसीन होने की कृपा करें।" उनके वचनों को सुनकर भरत बोले, "सदा से रघुकुल की रीति रही है कि पिता के स्थान पर ज्येष्ठ पुत्र राजा होता है। इसलिये इस सिंहासन पर मेरा कोई अधिकार नहीं है, इस पर केवल धर्मात्मा राम का ही अधिकार है। मैंने निश्चय किया है कि मैं वन से राम को लौटा लाउँगा उनके स्थान पर मैं स्वयं चौदह वर्ष पर्यंत वन में रहूँगा। अतः आप सभी तत्काल दलबल सहित, भैया राम को वापस लाने के लिये, वन में जाने की तैयारी करें।" भरत के वचनों ने सबमें एक नया उत्साह उत्पन्न कर दिया और राम के लौटने की आशा में वे डूबने उतराने लगे।
जब समस्त तैयारियाँ पूर्ण हो गईं तो, चतुरंगिणी सेना के साथ, भरत, शत्रुघ्न, तीनों माताएँ, मन्त्रीगण, दरबारी आदि वन की ओर चले। प्रजाजन उत्साह में भर कर राम और भरत की जय-जयकार करते जाते थे। गंगा तट पर, जहाँ से राजा गुह का नगर श्रंगवेरपुर निकट था, उन्होंने अपना पड़ाव डाला। अयोध्या से विशाल सेना आने का समाचार निषादराज गुह तक भी पहुँचा। उन्होंने अपने सेनापतियों को बुलाकर कहा, "सेनापतियों! आप लोगों को अच्छी प्रकार से विदित है कि रामचन्द्र हमारे मित्र हैं। भरत किस उद्देश्य से सेना लेकर आये हैं, हमें इसकी जानकारी नहीं है। अतः अपनी सेना को तुम लोग सतर्क करके इधर उधर छिपा दो। पाँच सौ नावों में सौ-सौ अस्त्र शस्त्रधारी सैनिक भी तैयार रहें। यदि भरत राम के पास निष्कपट भाव से जाना चाहे तो जाने दो, अन्यथा उन सबको मार्ग में ही मृत्यु की गोद में पहुँचा दो।" सेनापतियों को सावधान करने के पश्चात् वे स्वागत की सामग्री ले भरत के पास पहुँचे और बोले, "हे राघव! मैं आपके यथोचित सत्कार व्यवस्था नहीं कर पाया क्योंकि आप बिना सूचना के पधारे हैं। इसके लिये मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। आपसे निवेदन है कि रात्रि विश्राम यहीं करें और हमारा रूखा सूखा भोजन स्वीकार कर करके हमें धन्य करें।"
गुह के प्रेमभरे वचनों को सुनकर भरत ने कहा, "हे निषादराज! मैं ऋषि भारद्वाज के आश्रम में जाना चाहता हूँ, क्योंकि भैया राम वहीं गये हैं। यदि आप मुझे कुछ पथप्रदर्शक प्रदान कर सकें तो आपकी बड़ी कृपा होगी।" निषादराज बोले, "प्रभो! आप चिन्ता न करें। मैं और मेरे सैनिक आपका पथप्रदर्शन करेंगे। किन्तु आप रामचन्द्र के पास इतनी बड़ी सेना लेकर क्यों जा रहे हैं? निषाद के हृदय की शंका का अनुमान कर भरत बोले, "निषादराज! मैं भैया राम को वन से लौटाकर उनका राज्य उन्हें सौंपना चाहता हूँ क्योंकि वे मेरे बड़े भाई और पिता के तुल्य हैं। इसके लिये मेरी सब माताएँ और मन्त्री आदि भी मेरा साथ दे रहे हैं। भरत के वचन सुनकर गुह को संतोष हुआ। भरत आदि ने रात्रि को वहीं विश्राम किया। प्रातःकाल गुहराज की आज्ञा से गंगा के किनारे पर सैंकड़ों नौकाएँ लगा दी गईं जिनमें बैठकर सब गंगा पार उतर गये।
सब लोग महर्षि भारद्वाज के आश्रम में पहुँचे। उनका यथोचित सत्कार करने के पश्चात् महामुनि ने भरत से वन में आगमन का कारण पूछा। भरत ने हाथ जोड़कर कहा, "महामुने! मैं अपने भैया राम का दास हूँ। माता कैकेयी ने जो कुछ किया है मैं उसके सर्वथा विरुद्ध हूँ। मैं भैया राम के पास जाकर उनसे क्षमा याचना करना चाहता हूँ। मैं उनसे अयोध्या लौटने की प्रार्थना करूँगा ताकि वे लौटकर अपना राज्य सँभाले।" भरत की बात सुनकर मुनि बोले, "भरत! तुम वास्तव में महान हो। मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि तुम्हारा यश तीनों लोकों में फैले। आजकल राम सीता और लक्ष्मण के साथ चित्रकूट में निवास करते हैं। तुम कल प्रातः वहाँ चले जाना। आज की रात्रि यहीं विश्राम करो।" प्रातःकाल जब चित्रकूट जाने के लिये भरत मुनि भारद्वाज से अनुमति लेने पहुँचे तो उन्होंने भरत को समझाते हुये कहा, "भरत! तुम अपनी माता के साथ दोष दृष्टि न रखना, इसमें उनका कोई दोष नहीं है। कैकेयी द्वारा किये गये कार्य में परमात्मा की प्रेरणा है ताकि वन में दैत्य-दानवों का राम के हाथों विनाश हो सके।"
भरत अपनी माताओं एवं समस्त साथियों के साथ महर्षि से विदा लेकर चले और मन्दाकिनी के तट पर पहुँचे। वहाँ ठहरकर भरत ने मन्त्रियों से कहा, "प्रतीत होता है कि भैया की कुटिया यहाँ कहीं निकट ही है। सेना को साथ लेकर आगे जाने से यहाँ बसे हुये आश्रमवासियों की शान्ति और तपस्या में बाधा पड़ेगी। इसलिय आगे मैं सेना के साथ नहीं जाना चाहता। अतः तुम गुप्तचरों को भेजकर राम की कुटिया का पता लगवाओ।" मन्त्रियों की आज्ञा पाकर चतुर गुप्तचर इस कार्य के लिये चल पड़े।
posted by जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com) @ 11:58 PM,








